छठ पूजा का महत्व और परंपराएँ
छठ पूजा भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्योहार है, जिसमें व्रती परिवार सहित नदी या तालाब के किनारे खड़े होकर सूर्य उदय के समय जल अर्पित करते हैं। इस अनुष्ठान को उषा अर्घ्य कहा जाता है, और इसे सूर्यदेव को ऊर्जा और जीवन का स्रोत मानते हुए किया जाता है। सूर्य की पूजा का यह पर्व विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, जो श्रद्धालुओं के जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार करता है।
पारण और पर्व का समापन
छठ पूजा का अंतिम दिन पारण के साथ समाप्त होता है, जब सूर्य उदय होने के बाद व्रतियों का व्रत तोड़ना होता है। इस समय को पारण कहा जाता है, और यह परिवार और समाज में नए उत्साह और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। पारण के दौरान व्रती अपने व्रत का समापन करते हैं और नए संकल्प के साथ जीवन में नई शुरुआत करते हैं।
छठ का त्योहार क्यों है खास?
छठ त्योहार हर बिहारी के जीवन में विशेष स्थान रखता है। यह पर्व पूरे साल का इंतजार होता है, चाहे लोग देश-विदेश में कहीं भी क्यों न रहते हों। छठ घाटों की साफ-सफाई, घरों में पवित्रता और भक्ति का माहौल इस पर्व को और भी खास बना देता है। यही कारण है कि बिहार में इसे आस्था और परंपरा का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है, जो स्थानीय संस्कृति और श्रद्धा का प्रतीक है।
2026 में छठ पूजा की तिथियाँ और मुख्य आयोजन
छठ महापर्व 2026 में 13 नवंबर शुक्रवार को नहाय-खाय के साथ शुरू होगा। इसके बाद 14 नवंबर शनिवार को खरना और घर-घर में प्रसाद का आयोजन किया जाएगा। 15 नवंबर रविवार को संध्या अर्घ्य और मुख्य छठ पूजा का अनुष्ठान होगा। अंत में 16 नवंबर सोमवार को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाएगा। इन तिथियों पर श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।
छठ पूजा के नियम और परंपराएँ
छठ पूजा में शुद्धता, सात्त्विक भोजन और मन में आस्था का होना अनिवार्य है। व्रती साधारण और सादे कपड़े पहनते हैं, और पूजा के दौरान मन को शांत और श्रद्धा से भरपूर रखना जरूरी होता है। यह पर्व व्रत रखने वालों के लिए आत्मिक शुद्धि और धार्मिक अनुशासन का प्रतीक है, जो श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
कहाँ मनाई जाती है अधिक श्रद्धा के साथ?
छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़े धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। इन क्षेत्रों में यह त्योहार सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जहां हर घर और घाट पर इसकी भव्यता और आस्था देखने को मिलती है। यह पर्व इन इलाकों की परंपरा और धार्मिक जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है, जो स्थानीय संस्कृति को जीवंत बनाता है।










