धनतेरस का महत्व और परंपराएँ
धनतेरस का त्योहार हर वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है, जिसे धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। यह दिवाली के पहले दिन का त्योहार है, जिसमें नई वस्तुएं जैसे सोना, चांदी, झाड़ू और बर्तन खरीदने की परंपरा है। इस दिन को खास बनाने वाली मान्यताएँ और परंपराएँ इसे अन्य त्योहारों से अलग और विशेष बनाती हैं।
धनतेरस पर नई वस्तुएं खरीदने का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में धनतेरस को समृद्धि, सौभाग्य और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान धनवंतरी, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन नई वस्तुएं जैसे सोना, चांदी और शुभ बर्तन खरीदने से घर में आर्थिक समृद्धि और खुशहाली आती है। यह परंपरा घर में सुख-समृद्धि बनाए रखने का प्रतीक है।
धनतेरस का त्योहार क्यों खास है?
धनतेरस का त्योहार बाकी सभी पर्वों से अलग उसकी नई शुरुआत की उम्मीद है। इस दिन न केवल नई वस्तुओं की खरीदारी की जाती है, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और सफलता की कामना भी की जाती है। बहुत से लोग इस दिन नए व्यवसाय या शुभ कार्य शुरू करते हैं, ताकि भगवान धनवंतरी, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश का आशीर्वाद प्राप्त हो सके।
2025 में धनतेरस कब मनाई जाएगी?
इस वर्ष धनतेरस का त्योहार 18 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा।
धनतेरस पूजा का शुभ समय और मुहूर्त
धनतेरस की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर 8 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। इस समय के दौरान पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं।
यह जानकारी परंपरागत मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। प्रभात खबर इन मान्यताओं या जानकारियों की पुष्टि नहीं करता है।











