अहोई अष्टमी का महत्व और परंपराएं
अहोई अष्टमी का त्योहार कार्तिक मास की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, जो विशेष रूप से माताओं के बीच अपने बच्चों की लंबी उम्र और खुशहाली की कामना से जुड़ा है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा करती हैं। व्रत समाप्त करने के लिए वे तारों को अर्घ्य देकर पूजा संपन्न करती हैं। इस पर्व का मुख्य आकर्षण है स्याहु माला पहनना, जिसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है।
स्याहु माला का धार्मिक महत्व और विशेषता
हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी के दिन स्याहु माला को अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे दीर्घायु और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस माला को धारण करने से माता अहोई प्रसन्न होती हैं और संतान से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। सामान्यतः यह माला चांदी की बनी होती है, जिसमें छोटी-छोटी मोतियों को धागे में पिरोकर तैयार किया जाता है। पूजा के समय इसे माता को अर्पित करना शुभ माना जाता है, जिससे व्रत का फल अधिक प्राप्त होता है।
स्याहु माला की पूजा और धारण करने की विधि
अहोई अष्टमी के दिन स्याहु माला पर रोली और चंदन लगाएं, फिर उस पर अक्षत छिड़कें। इसके बाद इसे माता अहोई को अर्पित करें और माला पहनाने के बाद तिलक लगाएं। माता को माला पहनाने के बाद परनाम करें और संतान की लंबी उम्र की कामना करें। तत्पश्चात् माला को उतारकर स्वयं धारण करें। इस प्रक्रिया से माता की कृपा और व्रत का फल प्राप्त होता है, जो जीवन में सुख-समृद्धि लाता है।









