कोटा मेडिकल कॉलेज में भर्ती महिलाओं का जीवन संकट में
राजस्थान के कोटा मेडिकल कॉलेज में पिछले लगभग 70 दिनों से भर्ती पांच प्रसूताओं और उनके परिवारों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। इन महिलाओं को किडनी फेल होने की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है, और उनके परिजन अब सरकार से तत्काल कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। सोमवार को ये परिवार जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और एक भावुक ज्ञापन सौंपा, जिसमें उन्होंने कहा कि या तो उनकी बेटियों और बहुओं का तुरंत किडनी ट्रांसप्लांट किया जाए या फिर उन्हें जहर देकर मौत के घाट उतार दिया जाए। उनका कहना है कि लगातार दर्द, डायलिसिस और अनिश्चित भविष्य के कारण जीवन जीना अब उनके लिए असंभव हो गया है।
अस्पताल की लापरवाही और नकली दवाओं का आरोप
पीड़ित परिवारों का आरोप है कि 4 से 8 मई 2026 के बीच प्रसव के दौरान अस्पताल की कथित लापरवाही और नकली दवाओं के उपयोग के कारण इन पांच महिलाओं की दोनों किडनियां खराब हो गईं। इसके बाद से ही ये महिलाएं अस्पताल में भर्ती हैं और हर दो से तीन दिन में डायलिसिस करवा रही हैं। परिवार का कहना है कि दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद उन्हें भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला है। इन महिलाओं में रागिनी मीणा, आरती चौबदार, पिंकी ऐरवाल, सुशीला महावर और धन्नी सुमन शामिल हैं। पिछले 70 दिनों से अस्पताल का वार्ड ही उनका घर बन चुका है, और परिजन हर दिन उम्मीद करते हैं कि इलाज में सुधार होगा और वे घर लौट सकें। लेकिन समय के साथ यह उम्मीद कमजोर पड़ती जा रही है। अस्पताल की बेड, दवाएं और डायलिसिस मशीनें अब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं।
परिवारों का अंतिम प्रयास और सरकार से मांगें
परिजनों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर सरकार से अंतिम गुहार लगाई है। उनका कहना है कि यदि इलाज के दौरान किसी भी तरह की लापरवाही हुई है तो उसकी सजा मरीजों और उनके परिवारों को क्यों भुगतनी पड़ रही है। उनका आरोप है कि जिन महिलाओं को स्वस्थ बच्चे को जन्म देने के लिए अस्पताल लाया गया था, अब वे जीवनभर डायलिसिस पर रहने को मजबूर हैं। इससे न केवल मरीजों का जीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पूरे परिवार की जिंदगी भी बुरी तरह टूट चुकी है। प्रसूताओं का कहना है कि हर दूसरे या तीसरे दिन होने वाला डायलिसिस अब उनके लिए पीड़ा का कारण बन गया है। यह प्रक्रिया उनके शरीर को कमजोर कर रही है, मानसिक तनाव बढ़ा रही है और आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है। परिवार का कहना है कि अब उनकी सबसे बड़ी लड़ाई इलाज से अधिक सम्मान और जीवन को बचाने की है।











