अंडरट्रायल आदिवासी कैदियों की संख्या पर चिंता
MP के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने जेलों में बंद लगभग 22,947 अंडरट्रायल कैदियों में से 21 प्रतिशत के आदिवासी समुदाय से होने पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों का हवाला देते हुए, जल्द सुनवाई और आसान जमानत प्रक्रिया की मांग की है।
सिंघार ने बताया कि देश में कुल कैदियों का लगभग आधा हिस्सा यानी 50 प्रतिशत अंडरट्रायल है, जिनमें से करीब 21 प्रतिशत आदिवासी समुदाय से हैं। इसके अलावा, दलित समुदाय का हिस्सा 19 प्रतिशत है, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अंडरट्रायल आबादी में 40 प्रतिशत हिस्सा है।
सामाजिक और आर्थिक कमजोर वर्ग पर न्यायिक प्रक्रिया का प्रभाव
उन्होंने कहा कि आंकड़ों से स्पष्ट है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। गरीबी और जमानत न मिल पाने के कारण कई लोग अनावश्यक रूप से जेल में रहते हैं।
सिंघार ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा कि बिना दोष सिद्ध हुए किसी व्यक्ति का लंबा समय जेल में बिताना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है।
जेल सुधार और आदिवासी कल्याण के कदम
उन्होंने कहा कि गरीब और पिछड़े वर्ग के अंडरट्रायल कैदियों को लंबा समय जेल में रहने से रोकने के लिए, जमानत प्रक्रिया को आसान बनाने और जेल सुधारों पर तुरंत ध्यान देना आवश्यक है।
राज्य सरकार ने आदिवासी समुदाय के हित में कई कदम उठाए हैं, जिनमें जमीन कब्जे हटाने और आपराधिक मामलों को वापस लेने जैसे प्रयास शामिल हैं। 2009 तक, सरकार ने 87,549 वन अपराध मामलों में से अधिकांश वापस ले लिए हैं।
पिछले दस वर्षों में, 35,807 मामलों में से 28,645 का निपटारा हो चुका है, जबकि अभी भी 4,396 मामले अदालतों में लंबित हैं।
इसके अतिरिक्त, सरकार ने 15 नवंबर को आदिवासी गौरव दिवस पर 32 कैदियों को रिहा किया, जिनमें नौ आदिवासी समुदाय के सदस्य थे।











