कूनो नेशनल पार्क में एशियाई शेरों की बसावट का मुद्दा फिर से चर्चा में
मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क के दौरे के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के सामने एक बार फिर से एशियाई शेरों की पुनः बसावट का सवाल उभर कर आया है। कूनो संघर्ष समिति ने इस मुद्दे को लेकर धरना-प्रदर्शन किया और राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें उन्होंने कूनो में शेरों को फिर से बसाने की मांग दोहराई है। समिति का तर्क है कि शेरों के लिए 25 गांवों के लगभग 4545 परिवारों का विस्थापन किया गया था, इसलिए अब इस क्षेत्र का मूल उद्देश्य पुनः स्थापित किया जाना चाहिए।
धरना और ज्ञापन के माध्यम से शेरों की वापसी की मांग
रविवार को श्योपुर के गांधी पार्क में कूनो संघर्ष समिति के बैनर तले एक बड़ा धरना और सत्याग्रह का आयोजन किया गया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष अतुल चौहान कर रहे थे, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने जिला प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपते हुए राष्ट्रपति के समक्ष कूनो में एशियाई शेरों की बसावट की मांग रखी। समिति का कहना है कि वर्ष 1993-94 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) के सर्वेक्षण के आधार पर कूनो को देश का सबसे उपयुक्त और सुरक्षित क्षेत्र माना गया था, जहां शेरों की पुनः स्थापना संभव है।
विस्थापन और संरक्षण के प्रयासों का इतिहास
समिति का तर्क है कि शेरों के लिए 25 गांवों के लगभग 4545 परिवारों का विस्थापन किया गया था ताकि जंगल क्षेत्र मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त रहे। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि गुजरात के गिर अभयारण्य में शेरों की संख्या लगातार बढ़ रही है और वहां होने वाली मौतों को देखते हुए एशियाई शेरों के लिए दूसरा सुरक्षित आवास विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। समिति ने 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि एशियाई शेरों को पूरे देश की धरोहर मानते हुए कूनो में बसाने का निर्देश दिया गया था। उनका मानना है कि वर्तमान चीता परियोजना और शेरों की बसावट एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं, बल्कि दोनों को एक साथ वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है। इससे न केवल कूनो की वैश्विक पहचान मजबूत होगी, बल्कि स्थानीय पर्यटन और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।










