ग्वालियर हाईकोर्ट ने अवैध खनन पर कड़ा कदम उठाया
मध्य प्रदेश के ग्वालियर हाईकोर्ट ने अवैध खनन और प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत के खिलाफ ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। डबरा और बिलौआ क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन के एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया की एकल पीठ ने तुरंत प्रभाव से 16 खनन पट्टों को प्रतिबंधित कर दिया। यह फैसला राज्य में खनन क्षेत्र में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
अधिकारियों की कार्यशैली पर कोर्ट का कठोर रुख
सुनवाई के दौरान न्यायाधीश के सख्त तेवरों के सामने जिले के वरिष्ठ अधिकारी घबरा गए। अदालत ने न केवल अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए, बल्कि डबरा के एसडीएम (SDM) के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मामला भी दर्ज करने का आदेश दिया। इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई के तुरंत बाद ही प्रशासनिक स्तर पर डबरा के एसडीएम और तहसीलदार को पद से हटा दिया गया।
कठोर चेतावनी और सैटेलाइट साक्ष्यों का प्रयोग
कोर्ट ने शुक्रवार को मामले की गंभीरता को देखते हुए ग्वालियर कलेक्टर रुचिका चौहान को स्वयं कोर्ट रूम में उपस्थित होकर रिकॉर्ड दिखाने का निर्देश दिया। इस दौरान एक सरकारी कर्मचारी उनके पीछे फाइल लेकर चल रहा था, जिस पर न्यायाधीश ने आपत्ति जताते हुए कहा, “आप एक पब्लिक सर्वेंट हैं, अपनी फाइल खुद उठाइए। जनता की सेवा के लिए हैं, अधिकारियों की निजी चाकरी के लिए नहीं।” साथ ही, कोर्ट ने पूछा कि बिना एनओसी (NOC) और जुर्माने के, कैसे इन 16 खनन पट्टों का नवीनीकरण किया गया।
अदालत ने यह भी पूछा कि क्षेत्र से रोजाना कितने वैध और अवैध ट्रक निकलते हैं और क्या ई-चेक पोस्ट के सीसीटीवी फुटेज का मिलान किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित खनन माफिया नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है।
बिलौआ खदानों के संदर्भ में कोर्ट ने अधिकारियों को चेतावनी दी है कि यदि इस प्रतिबंध के बाद भी खदान से कोई भी कंकड़ बाहर निकला, तो उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाएगा। दोपहर में कोर्ट ने क्षेत्र की सैटेलाइट तस्वीरें और लाइव डेटा तलब किया, जिसके बाद कलेक्टर ने डिजिटल साक्ष्य प्रस्तुत किए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अब बिना हाईकोर्ट की अनुमति के इस क्षेत्र में कोई नया सीमांकन नहीं किया जाएगा और 2017 की जांच रिपोर्ट व कारण बताओ नोटिस को ही आधार माना जाएगा।











