मध्य प्रदेश में GI टैग से खास फसलों का मान्यता बढ़ेगा
मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र की सर्दियों में प्रसिद्ध पारंपरिक व्यंजन ‘गराड़ू’ और ‘बालम खीरे’ को अब जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग प्रदान किया गया है। यह कदम किसानों की आय में सुधार और इन फसलों के निर्यात के अवसरों को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हॉर्टिकल्चर विभाग के डिप्टी डायरेक्टर मंगल सिंह डोडवे ने एक समाचार एजेंसी से बातचीत में बताया कि रतलाम जिले में उगाए जाने वाले इन दोनों फसलों का खास महत्व है। इनकी लोकप्रियता क्षेत्र की विशिष्ट जलवायु, मिट्टी और पारंपरिक खेती के तरीकों के कारण है। हाल ही में रतलाम से प्राप्त आवेदन और डेटा के आधार पर इन फसलों को GI टैग मिला है।
रतलाम का बालम खीरा और गराड़ू की खासियत
रतलाम जिले के सैलाना क्षेत्र में उगाए जाने वाले बालम खीरे का बड़ा आकार और विशिष्ट रंग इसकी पहचान हैं। यह खीरा गर्मियों में खाया जाने वाला रसीला स्नैक है। वहीं, पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में उगाए जाने वाला गराड़ू स्टार्चयुक्त कंद है, जिसे सर्दियों में बड़े चाव से खाया जाता है। सामान्यतः गराड़ू को डीप-फ्राई कर मसालों और नींबू के रस के साथ परोसा जाता है।
किसानों की आय और फसलों का विस्तार
इस क्षेत्र में कई किसान इन दोनों फसलों की खेती करते हैं। वर्तमान में रतलाम जिले में लगभग 100 हेक्टेयर में बालम खीरे की खेती हो रही है, जबकि गराड़ू की खेती लगभग 120 हेक्टेयर में की जाती है। GI टैग से इन फसलों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मजबूत होगी। इससे किसानों को बेहतर दाम मिलने, खेती का दायरा बढ़ाने और निर्यात की संभावनाओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में पहले ही कई फूड प्रोडक्ट्स को GI टैग मिल चुका है, जिनमें रतलामी सेव, कड़कनाथ चिकन, रियावन लहसुन, चिन्नौर चावल और सुंदरजा आम शामिल हैं। GI टैग किसी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति, विशेष खूबियों और उसकी प्रतिष्ठा को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।










