भोजशाला विवाद में जैन समुदाय की नई दावेदारी
धार में भोजशाला विवाद के मामले में अब जैन समुदाय ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई है। जैन वकील दिनेश पी राजभर ने इंदौर उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दाखिल कर यह दावा किया है कि ब्रिटिश संग्रहालय में रखी गई प्रतिमा देवी सरस्वती नहीं, बल्कि जैन यक्षिणी अंबिका की है। इस समुदाय ने अब इस ऐतिहासिक स्थल पर पूजा-अर्चना का अधिकार मांगा है और 2003 के आदेश को चुनौती दी है।
हाई कोर्ट में जैन समुदाय का तर्क और ऐतिहासिक प्रमाण
राजभर ने तर्क दिया कि भोजशाला परिसर में पहले जैन मंदिर और गुरुकुल हुआ करते थे। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के तहत जैन अनुयायियों को इस स्थल पर पूजा करने का अधिकार है। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि राजा भोज हिंदू और जैन दोनों धर्मों के संरक्षक थे। 11वीं सदी के इस स्मारक में जैन वास्तुकला का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
राजभर ने पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि 1882 में शिमला के सरकारी रिपोर्ट और अन्य स्रोतों में यह उल्लेख है कि मस्जिद के कुछ हिस्से जैन समुदाय की पुरानी इमारतों से जुड़े हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि इस विवादित स्थल की संरचना में जैन वास्तुकला के संकेत मौजूद हैं।
प्रतिमा और ऐतिहासिक जुड़ाव का नया दावा
राजभर ने लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी एक प्रतिमा का जिक्र करते हुए कहा कि यह देवी सरस्वती नहीं, बल्कि जैन यक्षिणी अंबिका की मूर्ति है। उन्होंने यह भी बताया कि इस मूर्ति पर जैन तीर्थंकरों के प्रतीक चिह्न मौजूद हैं, जो इसे हिंदू देवी सरस्वती की मूर्तियों से अलग बनाते हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 2024 में उच्च न्यायालय के निर्देश पर किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण में इस स्थल के जैन समुदाय से जुड़े ऐतिहासिक पहलुओं को नजरअंदाज किया है। राजभर का मानना है कि सरकार इस विवादित स्मारक के संबंध में एक समुदाय के दावों का समर्थन कर रही है, जो संदेह पैदा करता है।
बता दें कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर बेंच 6 अप्रैल से इस स्थल की धार्मिक प्रकृति को लेकर दायर याचिकाओं और रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। जहां हिंदू इसे वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानते हैं, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में पहचानता है।









