राजनीतिक रणनीति और चुनाव प्रबंधन में कांग्रेस की चुनौतियां
वर्तमान में जब भारतीय राजनीति में बीजेपी (BJP) विपक्षी दलों की लगातार आलोचनाओं का सामना कर रही है, तो आरोप लग रहे हैं कि केंद्रित प्रयासों के तहत वह संसदीय संख्या बढ़ाने के लिए नेताओं के दल-बदल और राजनीतिक जोड़-तोड़ में लगी हुई है। आगामी संसद सत्र में परिसीमन बिल जैसे विवादास्पद मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है, जो राजनीतिक माहौल को और गर्मा सकती है।
वहीं, कांग्रेस (Congress) को भी अपने संगठनात्मक कमजोरियों का सामना करना पड़ा है। मध्य प्रदेश और झारखंड में राज्यसभा की महत्वपूर्ण सीटें जीतने में असफलता ने पार्टी की संगठनात्मक क्षमता, गठबंधन प्रबंधन और विधायी रणनीति की कमियों को उजागर किया है। खास बात यह है कि झारखंड में समर्थन बनाए रखने के संघर्ष के बीच, कर्नाटक (Karnataka) में कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की, जहां विधान परिषद चुनावों में पार्टी के 135 विधायकों के बावजूद उसे 16 अतिरिक्त वोट मिले। इन विभिन्न परिणामों ने सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर एक ही पार्टी, एक ही दिन हुए चुनावों में इतनी भिन्न-भिन्न प्रदर्शन क्यों करती है।
झारखंड और मध्य प्रदेश में चुनावी असफलताएं
झारखंड में कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा की जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी ने वरिष्ठ नेताओं भूपेश बघेल और अजय शर्मा को तैनात किया था। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री बघेल ने कई महत्वपूर्ण चुनावी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया, जिनमें 2021 के असम विधानसभा चुनाव, 2026 के चुनाव की तैयारी और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव शामिल हैं। लेकिन इन प्रयासों का पार्टी को कोई खास लाभ नहीं हुआ। सूत्रों का कहना है कि बघेल रांची में केवल छह से आठ जून के बीच ही रहे, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से एक बार मिले और बिना चुनाव प्रबंधन के महत्वपूर्ण चरणों की देखरेख किए वापस चले गए।
वहीं, हरियाणा में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के चुनाव प्रबंधन में अजय शर्मा भी शामिल थे। यहां पार्टी के उम्मीदवार अजय माकन को निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा से हार का सामना करना पड़ा, जबकि गणित उनके पक्ष में था। एक सूत्र ने बताया कि AICC के संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने झारखंड में चुनाव में विशेष रुचि नहीं ली, जिसकी वजह से हार हुई। साथ ही, अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि RJD (Rashtriya Janata Dal) के चार विधायकों और CPI(ML) के दो विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग कर परिमल नथवानी का समर्थन किया। यह घटना गठबंधन की कमजोरियों को उजागर करती है, और कई नेताओं का तर्क है कि यदि कांग्रेस नेतृत्व ने अधिक सक्रियता और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई होती, तो इन समस्याओं को टाला जा सकता था।
कांग्रेस की रणनीति और कर्नाटक की सफलता
जब झारखंड में कांग्रेस अपने समर्थन को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब कर्नाटक (Karnataka) के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष बी.के. हरिप्रसाद अपने समर्थन आधार को मजबूत करने में लगे थे। कांग्रेस के पांचों MLC उम्मीदवार विधान परिषद चुनाव आसानी से जीत गए। पार्टी के पास 135 विधायक थे, फिर भी उसके उम्मीदवारों को कुल 151 वोट मिले। बीजेपी (BJP) को अपेक्षा से कम वोट मिले; उसे 64 के बजाय 57 वोट ही प्राप्त हुए, जबकि JDS (Janata Dal Secular) को उम्मीद के मुकाबले सिर्फ 14 वोट मिले। यह संकेत है कि कांग्रेस के पक्ष में व्यापक क्रॉस-वोटिंग हुई। हरिप्रसाद ने कहा कि पार्टी ने ‘सभी संभावनाओं का विश्लेषण किया और रणनीति बनाई’, और 2014 के बाद बीजेपी शासित राज्यों में कांग्रेस की सफलताओं का उदाहरण भी दिया।
एक अन्य नेता का तर्क है कि कांग्रेस ने बीजेपी और JDS के विधायकों के बीच बढ़ रहे असंतोष का फायदा उठाया, जिससे उसे कर्नाटक में अतिरिक्त वोट मिले। यह रणनीति पार्टी की राजनीतिक सूझबूझ का परिणाम थी, जो अप्रत्यक्ष चुनावों में भी प्रभावी साबित हुई।
मध्य प्रदेश में चुनावी चूक और उसके परिणाम
मध्य प्रदेश में राज्यसभा के चुनाव से पहले कांग्रेस की प्रमुख उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रिटर्निंग ऑफिसर ने खारिज कर दिया, जिससे पार्टी को बड़ा झटका लगा। यह घटना पार्टी के अंदर व्यापक रूप से चर्चा का विषय बन गई, क्योंकि माना जा रहा था कि नटराजन राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की करीबी हैं। सूत्रों का कहना है कि इस अस्वीकृति से शीर्ष नेतृत्व को गहरा आघात पहुंचा है।
कुछ नेताओं का तर्क है कि नटराजन को ही जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, खासकर जब वह एक शत्रुतापूर्ण राज्य से चुनाव लड़ रही थीं। वहीं, अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि पार्टी ने कई वरिष्ठ नेताओं जैसे कमल नाथ, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, कमलेश्वर पटेल, जीतू पटवारी और शोभा ओझा की अनदेखी की, जिससे चुनावी रणनीति कमजोर हुई।
झारखंड और मध्य प्रदेश में इन असफलताओं ने कांग्रेस के सामने लगातार चुनौतियों को उजागर किया है। पार्टी का आरोप है कि बीजेपी (BJP) रणनीतिक रूप से अवैध शिकार और राजनीतिक लालच का इस्तेमाल कर विपक्ष को कमजोर कर रही है। यदि कांग्रेस 2027 और 2029 के चुनावों से पहले मजबूत विपक्ष के रूप में उभरना चाहती है, तो उसे अपने गठबंधनों, उम्मीदवारों और विधायी गणित को बेहतर ढंग से प्रबंधित करना होगा।










