बुजुर्ग की अंतिम इच्छा और नेत्रदान की प्रेरणा
एक मोबाइल फोन, जो हमेशा सिरहाने रखा रहता था, उसकी कहानी आज भी लोगों के दिलों को छू जाती है। हर बार जब स्क्रीन पर घंटी बजती, तो उम्मीद जागती कि शायद इस बार किसी बेटी का फोन होगा। उस आवाज़ का इंतजार, जो कहेगी “पापा, कैसे हो?” लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में यह इंतजार सिर्फ एक सपना बनकर रह गया।
सोनीपत के वृद्ध आश्रम में रहने वाले शिवचरण रामरतन गुप्ता की कहानी केवल एक बुजुर्ग की मौत की कहानी नहीं है। यह उस पिता की कहानी है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी बेटियों के उज्जवल भविष्य के लिए समर्पित कर दी। लेकिन अंतिम समय में उसकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि वह अपने परिवार की आवाज सुन सके। विडंबना यह है कि जिन आंखों ने अपने बच्चों को बचपन से बड़ा होते देखा, स्कूल जाते देखा, अपने पैरों पर खड़ा होते देखा, वे आखिरी दिनों में उनकी एक झलक देखने को तरसती रहीं।
परिवार की मेहनत और पिता का गर्व
शिवचरण का व्यवसाय कपड़ों का था, और उन्होंने अपनी तीन बेटियों की पढ़ाई-लिखाई को हमेशा प्राथमिकता दी। बड़ी बेटी अनीता आज नेपाल में अध्यापिका हैं, दूसरी बेटी निशा उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में शिक्षण कार्य से जुड़ी हैं, और सबसे छोटी प्रिया मुंबई में अपने परिवार के साथ रहती हैं। उनके करीबियों का कहना है कि शिवचरण अक्सर गर्व से बताते थे कि उनकी बेटियां अपने पैरों पर खड़ी हैं, जो हर पिता की सबसे बड़ी पूंजी होती है।
बढ़ती उम्र और अंतिम दिनों की चुनौतियां
करीब डेढ़ साल पहले शिवचरण और उनकी पत्नी मीना गुप्ता सोनीपत के वृद्ध आश्रम में रहने चले आए। उम्र बढ़ने और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण दोनों ने यहीं रहने का फैसला किया। कुछ समय बाद उनकी पत्नी का निधन हो गया, और आश्रम ही उनका नया घर बन गया। वहां रहने वाले बुजुर्ग, कर्मचारी और संचालक ही उनका परिवार बन गए। पत्नी के जाने के बाद शिवचरण पहले से अधिक शांत रहने लगे, लेकिन मोबाइल फोन रखने की आदत नहीं छोड़ी। उन्हें उम्मीद रहती थी कि बेटियों का फोन आएगा।
बीमारी बढ़ने पर बेटियों को सूचित किया गया, और उनसे आग्रह किया गया कि यदि संभव हो तो वे पिता से मिल लें। आश्रम के अनुसार, शिवचरण अक्सर पूछते थे कि क्या किसी बेटी का फोन आया है। जब भी फोन बजता, उनके चेहरे पर उम्मीद की मुस्कान आ जाती, लेकिन कई बार वह किसी और का फोन होता। तीनों बेटियों को पिता की गंभीर स्थिति की जानकारी दी गई थी, लेकिन वे नहीं आ सकीं।
आखिरी समय और नेत्रदान का संदेश
मंगलवार तड़के करीब साढ़े तीन बजे शिवचरण ने अंतिम सांस ली। आश्रम प्रबंधन ने तुरंत बेटियों को सूचित किया। उन्होंने कहा कि यदि वे आ रही हैं, तो अंतिम संस्कार को कुछ समय के लिए टाल दिया जाएगा। लेकिन बेटियों ने अपनी परिस्थितियों का हवाला देते हुए आने में असमर्थता जताई। इसके बाद श्मशान घाट पर एक भावुक दृश्य देखने को मिला, जहां चिता जल रही थी और मोबाइल स्क्रीन पर बेटियां वीडियो कॉल के जरिए अपने पिता को अंतिम विदाई दे रही थीं। बड़ी बेटी ने ऑनलाइन 5100 रुपये भेजकर अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। बाद में अस्थियों का गंगा में विसर्जन करने का निर्णय लिया गया।
यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यदि यह कहानी सिर्फ अकेलेपन की होती, तो शायद यह केवल एक दुखद अनुभव होती। लेकिन शिवचरण ने अपने जीवन का सबसे बड़ा संदेश मृत्यु के बाद भी दिया। उनकी इच्छा और परिवार की सहमति से उनके नेत्रदान किए गए। जिन आंखों ने जीवन भर अपने परिवार को देखा, वे अब किसी अजनबी की दुनिया रोशन करेंगी। यह नई शुरुआत उन आंखों से होगी, जो आखिरी वक्त तक अपने परिवार की एक झलक देखने को तरसती रहीं।











