दिल्ली में वीआईपी मूवमेंट का ट्रैफिक प्रभाव और पुलिस की जानकारी
जब दिल्ली में वीआईपी मूवमेंट होता है, तो शहर की सड़कें पूरी तरह से थम जाती हैं। ट्रैफिक सिग्नल हरे होने के बावजूद वाहन नहीं बढ़ते, क्योंकि काफिले का गुजरना जारी रहता है। सायरन बजते हैं, पुलिसकर्मी इशारे करते हैं, और कई बार दो मिनट की प्रतीक्षा में बीस मिनट तक का समय बीत जाता है। इस दौरान एंबुलेंस, स्कूल बसें और आम यात्री सभी प्रभावित होते हैं। कई लोगों की नौकरी के इंटरव्यू, फ्लाइट का समय या अस्पताल पहुंचने की अंतिम कोशिश बीच रास्ते में ही रुक जाती है। बावजूद इसके, न तो यह बताया जाता है कि ट्रैफिक क्यों रोका गया, न ही यह कि कितनी देर तक यह व्यवस्था लागू रहती है, और न ही यह कि यह सुविधा किसे मिली है।
दिल्ली पुलिस की चुप्पी और ट्रैफिक रोकने के नियम
इस विषय में आजतक ने दिल्ली पुलिस से सीधे सवाल किए और इसके लिए दो अलग-अलग RTI (राइट टू इंफॉर्मेशन) आवेदन भी लगाए। इन सवालों का जवाब मिलने के बजाय, पुलिस की चुप्पी ने कई अहम बातें उजागर कर दी हैं। पहले सवाल में पूछा गया कि दिल्ली की सड़कों पर वीआईपी ट्रीटमेंट किसे मिलता है, ट्रैफिक कब और किन नियमों के आधार पर रोका जाता है, और 2020 से अब तक कितनी बार ऐसा हुआ है। साथ ही यह भी पूछा गया कि इससे आम जनता को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इन सवालों के जवाब में दिल्ली पुलिस के दो ट्रैफिक विभागों ने कहा कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग में घूमती रहीं, जैसे कोई जिम्मेदारी लेना नहीं चाहता हो। अंत में दोनों विभागों ने यह स्वीकार किया कि वीआईपी मूवमेंट से जुड़ी कोई सार्वजनिक शिकायत का रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
पुलिस की वित्तीय रिपोर्ट और गाड़ियों का खर्च
RTI के दूसरे सवाल में पूछा गया कि वीआईपी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस कितनी रकम खर्च करती है और 2023 के G20 शिखर सम्मेलन के दौरान खरीदी गई विशेष गाड़ियों का क्या हुआ। दिल्ली पुलिस की सुरक्षा शाखा ने बताया कि 2020 से पहले के उनके वित्तीय रिकॉर्ड नष्ट कर दिए गए हैं, जिससे पिछले 15 वर्षों का खर्च पता नहीं चल पाता। उपलब्ध चार साल के रिकॉर्ड से पता चलता है कि 2021-22 में किराये की वीआईपी गाड़ियों पर ₹1.43 करोड़ खर्च हुए, जो 2022-23 में बढ़कर ₹23.13 करोड़ हो गया। इसके बाद खर्च घटकर ₹16.89 करोड़, फिर ₹2.05 करोड़ और इस साल शून्य पर आ गया। इन उतार-चढ़ाव का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। कुल मिलाकर, चार वर्षों में किराये की गाड़ियों पर ₹43 करोड़ से अधिक खर्च हुआ, जबकि खरीदी गई गाड़ियों का कोई रिकॉर्ड नहीं है।









