दिल्ली के जंतर-मंतर पर 45 दिनों का आंदोलन: सोनम वांगचुक का खुलासा
दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे 45 दिनों के आंदोलन को लेकर सोनम वांगचुक ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे भीड़ कम होने लगी, वैसे-वैसे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं का हौसला भी टूटने लगा था। इस स्थिति में कई नेताओं ने आंदोलन को समाप्त करने के लिए बार-बार हाथ जोड़कर आग्रह किया था।
नेताओं का मनोबल गिरने का कारण और आंदोलन की दिशा
वांगचुक ने कहा, “मैं नाम नहीं लूंगा, लेकिन कुछ नेताओं ने बार-बार यह सवाल उठाया कि इस आंदोलन से बाहर कैसे निकला जाए। जब मैंने उनसे पूछा कि वे और कितने दिन रुक सकते हैं, तो उनमें से कुछ ने हाथ जोड़कर कहा कि वे जाना चाहते हैं और इस स्थान को छोड़ना चाहते हैं।” उन्होंने यह भी बताया कि CJP का जज्बा और आंदोलन को वापस न लेने का संकल्प समय-समय पर बदलता रहा, और इसमें उनके राजनीतिक दिमाग की भूमिका भी थी।
भीड़ की कमी से नेताओं का हौसला टूटा और आंदोलन का अंत निकट
सोनम वांगचुक ने बताया कि CJP नेताओं का उत्साह पूरी तरह जनता की भीड़ पर निर्भर था। 20 जुलाई को संसद मार्च से पहले जब वांगचुक को जबरन अस्पताल ले जाया गया था, उस समय नेताओं का हौसला काफी हद तक टूट चुका था। उस समय, आंदोलन का अंत करने के विकल्पों पर विचार किया जा रहा था। यहां तक कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी का नाम भी अनशन समाप्त कराने के लिए सुझाया गया था, ताकि आंदोलन का सम्मानजनक अंत हो सके।
आंदोलन से पहले वांगचुक का समर्थन और परीक्षा
वांगचुक ने बताया कि 20 जून को जब CJP ने आंदोलन शुरू किया, तो नेताओं ने उनसे समर्थन और अनशन में भाग लेने का अनुरोध किया। उस समय, वांगचुक स्विट्जरलैंड में एक साइंस कॉन्फ्रेंस में थे। उन्होंने कहा कि वे 28 जून को आंदोलन में शामिल होंगे, जबकि पार्टी ने 20 जून से प्रदर्शन शुरू किया था। इस 8 दिन के इंतजार को देखकर पार्टी के नेता हैरान रह गए थे। अंततः, युवा कार्यकर्ताओं ने 28 जून को वांगचुक के साथ अनशन शुरू किया।










