दिल्ली की सड़कों पर बेघर महिलाओं का जीवन संघर्ष
यदि आप दिल्ली की पुरानी गलियों जैसे निजामुद्दीन, मुनिरका या अन्य पुराने इलाकों से गुजरें, तो सड़क किनारे सोते हुए कई लोग आपको दिखाई देंगे। ये भीड़-भाड़ वाली आबादी बेघरपन की तस्वीर पेश करती है, जिनके घर-द्वार और आरामदायक जीवन से दूर हैं। इन लोगों में महिलाएं भी शामिल हैं, जो हर रात नए खतरों का सामना कर रही हैं। इनमें रेप, मारपीट, छिनैती जैसी घटनाएं आम हैं, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन खतरों के बीच जीने की आदत सी बन जाती है।
आजतक.in ने इन महिलाओं से बातचीत की, जिनमें से एक परवीन (नाम बदला हुआ) भी हैं। वह बंगला साहिब के पास बने शेल्टर होम में रहती हैं। प्रयागराज (Prayagraj) की रहने वाली परवीन पहले एक सामान्य गृहिणी थीं, शादीशुदा, घर-बार वाली, और अपने बच्चों के साथ सुखी जीवन बिताती थीं। लेकिन अब उनकी जिंदगी सड़क पर गुजर रही है, और हर रात नए खतरे उन्हें घेरते हैं।
सड़क पर जीवन और संघर्ष की कहानी
परवीन ने बताया कि वह अपने पति की तलाश में दिल्ली आई थीं, जो डिप्रेशन के कारण घर छोड़कर चले गए थे। कुछ समय तक उन्होंने सड़क पर बिताया, लेकिन यह अनुभव उनके अंदर गहरे घाव की तरह था। हरे सलवार-कमीज और छोटी काली बिंदी लगाए उनकी तस्वीर अभी भी उनके चेहरे पर झलकती है। पहली नजर में वे होमलेस नहीं लगतीं, उनके कपड़े, बाल और बोलने का अंदाज सब कुछ सामान्य सा प्रतीत होता है। लेकिन उनके अंदर का दर्द और संघर्ष कहीं छुपा हुआ है।
परवीन ने बताया कि वह अपने पति की खोज में दरगाह के आसपास घूमती रहीं, लेकिन वह नहीं मिले। फोन भी बंद था। घरवालों ने उन्हें समझाया कि लौटना जरूरी है, लेकिन वह अपने बच्चों और जीवन के लिए दिल्ली में रहना चाहती थीं। ससुराल में सब कुछ खत्म हो चुका था, और उनके पास कोई विकल्प नहीं था। घर छोड़कर वह दरगाह के आसपास रहने लगीं, जहां खाने-पीने का इंतजाम तो होता था, लेकिन जीवन की कठिनाइयां भी साथ ही थीं।
जीवन की जद्दोजहद और उम्मीदें
परवीन ने बताया कि उनके पास अब कोई पैसा नहीं था, और उन्होंने अपने गहने बेचकर बच्चों का पालन-पोषण किया। वह अपने पति की तलाश में दरगाह के आसपास बैठी रहीं, लेकिन वह नहीं मिले। एक रात वह दरगाह के किनारे ही सो गईं, और जब जागीं तो उनका बैग, पैसे और पायल सब गायब थे। घर फोन करने पर भी कोई जवाब नहीं मिला। उनके लिए यह समय बहुत कठिन था, और वह अपने मायके से भी संपर्क नहीं कर सकीं।
उनके जीवन में भूख और गरीबी का सामना करना पड़ा। एक बार उनकी बेटी भूख से परेशान होकर पानी पी गई, और रात को उल्टियां होने लगीं। वह अपने बच्चों को पालने के लिए हर संभव कोशिश कर रही थीं, लेकिन समाज और परिस्थितियों ने उन्हें तोड़ दिया। कई बार गलत जगहों पर बैठकर, इशारों में मदद मांगते हुए, वह अपने जीवन की जंग लड़ रही थीं।
आज परवीन शेल्टर होम में रहती हैं और महीने की कमाई से अपने परिवार का सहारा बन चुकी हैं। उनके पास अब अपने घर की यादें हैं, और उम्मीद है कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर अपने जीवन को बेहतर बनाएंगे। उनके जीवन की कहानी संघर्ष और उम्मीद का प्रतीक है, जो हमें यह सिखाती है कि कठिनाइयों के बीच भी आशा की किरणें जिंदा रहती हैं।











