सुप्रीम कोर्ट में नोटिस जारी करने के मुद्दे पर गंभीर चर्चा
दिल्ली में SIR (सिस्टम इनफॉर्मेशन रजिस्टर) के तहत जारी नोटिसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस मामले को अत्यंत गंभीर और चौंकाने वाला बताया। उन्होंने कहा कि जो कुछ भी हुआ है, वह बहुत ही आश्चर्यजनक है और कोर्ट को यह देखना चाहिए कि आखिरकार इस प्रक्रिया में क्या हो रहा है।
निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया और नियमों में सुधार की आवश्यकता
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान कहा कि चुनावी नियमों में सुधार की जरूरत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि नोटिस मशीनी तरीके से जारी किए जा रहे हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि ये नोटिस कंप्यूटर से तैयार किए गए हैं। कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से पूछा कि क्या इन नोटिस में बदलाव की आवश्यकता है और क्या इन विसंगतियों का कारण स्पष्ट रूप से बताया जा सकता है।
निर्वाचन आयोग ने जवाब दिया कि दिल्ली में जारी नोटिस में विसंगतियों के कारण बताए गए हैं और संबंधित जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराई गई है। आयोग ने यह भी कहा कि शिकायतों के समाधान के लिए कदम उठाए जा रहे हैं और दूसरे राज्यों में भी इस तरह के मुद्दे उठाए गए हैं।
प्रशांत भूषण का विश्लेषण और नोटिस की जटिलताएँ
प्रशांत भूषण ने इस मामले में पश्चिम बंगाल के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि लगभग 90 प्रतिशत आवेदक दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल हो गए थे। उन्होंने यह भी बताया कि इस प्रक्रिया में करीब 12 साल लग सकते हैं। भूषण ने यह भी कहा कि नोटिस मिलने के बाद व्यक्ति को अपने दस्तावेज लेकर जाना पड़ता है, लेकिन ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ का कारण स्पष्ट नहीं किया जाता।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे. बागची ने सवाल किया कि यदि नोटिस में केवल ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ लिखा है, तो विसंगति का कारण क्यों नहीं बताया जाता। इस पर CJI ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति 2019 में दिल्ली आया हो, तो उसे यह नोटिस मिल सकता है कि वह 2019 से पहले मैप नहीं है।
प्रशांत भूषण ने यह भी बताया कि यदि किसी व्यक्ति और उसके माता-पिता की उम्र में अंतर है, तो नोटिस के साथ दी गई 12 दस्तावेजों की सूची में माता-पिता से जुड़ी जानकारी क्यों नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि कोई बच्चा समय से पहले जन्मा हो, तो ऐसी स्थिति को कैसे समझाया जाएगा।
सुनवाई के दौरान 33 लाख लोगों को नोटिस जारी किए जाने का मुद्दा भी उठा। जस्टिस जे. बागची ने पूछा कि क्या वास्तव में इतनी संख्या में नोटिस भेजे गए हैं। निर्वाचन आयोग ने जवाब दिया कि लगभग 30 लाख नोटिस भेजे गए हैं। कोर्ट ने पूछा कि इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए कितने BLO (ब्लॉक लेवल ऑफिसर) तैनात किए गए हैं। आयोग ने बताया कि 14,000 BLO इस काम में लगे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सुधार के लिए उपलब्ध समय को लेकर भी सवाल किया। आयोग ने कहा कि दिल्ली अभी चुनावी राज्य नहीं है, इसलिए पर्याप्त समय है और उन्होंने 29 अक्टूबर की तारीख तय की है। कोर्ट ने पूछा कि इस तारीख तक पूरी प्रक्रिया कैसे पूरी की जाएगी। आयोग ने कहा कि किसी भी व्यक्ति का नाम नहीं हटाया जाएगा और जरूरत पड़ने पर समय बढ़ाने के लिए तैयार हैं।
आम जनता के लिए FAQ और घर-घर जाकर जानकारी जुटाने का सुझाव
सीजेआई ने सुझाव दिया कि अलग-अलग राज्यों और याचिकाओं में अब करीब 20 से 25 सामान्य सवाल सामने आ रहे हैं। उन्होंने निर्वाचन आयोग से कहा कि इन सवालों के जवाब FAQ के रूप में जारी किए जाएं, ताकि मतदाता आसानी से समझ सकें कि उन्हें क्या करना है। साथ ही, उन्होंने कहा कि इन निर्देशों को सरल भाषा में समझाना जरूरी है ताकि जनता का भरोसा बना रहे।
सीजेआई ने उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली के बहुत से लोग मूल निवासी हो सकते हैं, जिनके माता-पिता के नाम या अपने नाम 2002 की वोटर लिस्ट में हो सकते हैं। वहीं, जो लोग बाद में दिल्ली आए हैं, उन्हें यह साबित करना पड़ सकता है कि वे दूसरे शहर से दिल्ली आए हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों की जांच कैसे की जाएगी।
कपिल सिब्बल ने भी एक मामले का जिक्र किया जिसमें एक व्यक्ति को नोटिस मिला था। बताया गया कि उसकी मां की मौत 60 साल की उम्र में हुई थी, और वह व्यक्ति अब 65 साल का है, फिर भी उसे उम्र के अंतर को लेकर नोटिस मिला। इस पर ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की जांच के तरीके पर सवाल उठाए गए।
घर-घर जाकर जानकारी जुटाने और BLO की भूमिका
सुनवाई के दौरान BLO के घर-घर जाकर जानकारी जुटाने के तरीके पर भी चर्चा हुई। यह सवाल उठाया गया कि दिल्ली जैसे शहर में जहां कई इमारतों में लिफ्ट नहीं हैं, वहां BLO हर घर तक कैसे पहुंचेंगे। जस्टिस जे. बागची ने कहा कि दिल्ली में यह प्रक्रिया आसान हो सकती है, लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे दूरदराज इलाकों में यह कठिन हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि नोटिस वार्ड कार्यालयों में उपलब्ध कराए जाएं और लोगों को वहां सहायता लेने के लिए कहा जाए।
सीजेआई ने कहा कि दिल्ली में BLO का नाम और नंबर लोगों को दिया जा सकता है, और उन्हें BLO से मिलने या वार्ड कार्यालय जाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। निर्वाचन आयोग ने भी इस प्रक्रिया को पहले से ही लागू करने की बात कही।
प्रशांत भूषण ने यह भी कहा कि रिटायर्ड जजों, ब्यूरोक्रेट्स और मंत्रियों को भी नोटिस जारी किए गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग इसे निष्पक्ष प्रक्रिया मान रहे हैं क्योंकि यह सभी वर्गों के लोगों को समान रूप से नोटिस भेजने का प्रयास है।










