दिल्ली में प्रदूषण और कोहरे का कहर जारी
दिल्ली में वायु गुणवत्ता और मौसम की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है, जिससे शहर की जीवनशैली पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। वर्तमान में अधिकांश इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 350 से ऊपर पहुंच चुका है, और वेंटिलेशन इंडेक्स 800 तक गिर चुका है, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक माना जाता है।
मौसम विभाग के अनुसार, शनिवार तक दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सुबह के समय हल्का कोहरा और आंशिक बादल छाए रहेंगे, साथ ही हवा की गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ श्रेणी में बनी रहेगी। हवा की गति 5 किलोमीटर प्रति घंटे से भी कम हो रही है, जिससे हवा का प्रवाह रुक सा गया है और प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ रहा है।
खतरनाक AQI स्तर और स्वास्थ्य जोखिम
सुबह 8 बजे के आंकड़ों के अनुसार, कई इलाकों में AQI खतरनाक स्तर से भी ऊपर पहुंच गया है। दीप विहार में AQI 850 तक दर्ज किया गया, जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत जोखिमपूर्ण है। इसके अलावा, भलस्वा लैंडफिल क्षेत्र में AQI 550, रोहिणी सेक्टर में 631, आईटीआई जहांगपुरी में 690, और अशोक विहार में 754 का स्तर देखा गया है।
दिल्ली के कई हिस्सों में प्रदूषण का स्तर इतना अधिक है कि यह स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। राजधानी के कुछ इलाकों में AQI 431 तक पहुंच चुका है, जो ‘सीवियर’ श्रेणी में आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ते प्रदूषण का सीधा असर बुजुर्गों, बच्चों और सांस की बीमारियों से जूझ रहे व्यक्तियों पर पड़ रहा है, और उन्हें विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।
स्वास्थ्य और आर्थिक प्रभाव
डॉक्टरों का कहना है कि बढ़ते प्रदूषण का सीधा असर गर्भवती महिलाओं, बच्चों और वृद्ध व्यक्तियों पर पड़ रहा है। PM2.5 के स्तर में वृद्धि से समय से पहले प्रसव का खतरा 70 प्रतिशत तक बढ़ जाता है, और कम वजन वाले बच्चों के जन्म का खतरा 40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। हर 10 माइक्रोग्राम PM2.5 की बढ़ोतरी से जन्म से पहले होने वाले जोखिम में 12 प्रतिशत का इजाफा होता है। इससे बच्चों में अस्थमा, एलर्जी और विकास संबंधी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
प्रदूषण ने दिल्ली की आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित किया है। व्यापारिक क्षेत्रों में लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है, और साउथ एक्स, सदर बाजार, कमला नगर जैसे इलाकों में दुकानों पर ग्राहक कम आ रहे हैं। पर्यटन, ऑटो बिक्री और निर्माण सेक्टर भी इस संकट से जूझ रहे हैं, जिससे मेडिकल खर्च और कामकाजी लोगों की उत्पादकता दोनों प्रभावित हो रही हैं।











