दिल्ली एमसीडी उपचुनाव में राजनीतिक मुकाबला तेज
दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के 12 वार्डों में हो रहे उपचुनाव को लेकर राजनीतिक गर्माहट बढ़ गई है। इस चुनाव को बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच त्रिकोणीय संघर्ष माना जा रहा है। बीते 27 वर्षों के बाद दिल्ली में सत्ता वापसी कर चुकी भारतीय जनता पार्टी ने इस उपचुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता स्वयं मोर्चा संभाल रही हैं और पार्टी के प्रत्याशियों को जीत दिलाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रही हैं।
आम आदमी पार्टी की रणनीति और नेताओं की अनुपस्थिति
वहीं, आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता इस चुनाव से दूरी बनाए हुए हैं। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आतिशी, सांसद संजय सिंह और राघव चड्ढा जैसे प्रमुख नेताओं ने प्रचार में भाग नहीं लिया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज और दुर्गेश पाठक रोजाना पांच से सात जनसभाएं कर रहे हैं, लेकिन शीर्ष नेतृत्व के प्रचार में न उतरने से कई सवाल खड़े हो गए हैं।
उपचुनाव का महत्व और राजनीतिक रणनीति
दिल्ली में 12 वार्डों पर हो रहे इस उपचुनाव का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इनमें से नौ सीटें बीजेपी के पास थीं और तीन सीटें आम आदमी पार्टी ने 2022 के चुनाव में जीती थीं। इन सीटों पर उपचुनाव के कारण अब नई राजनीतिक जंग छिड़ गई है। खासतौर पर मटिया महल सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है, जहां चार प्रमुख फ्रंट सामने हैं।
पार्टी के संगठन मंत्री कुमार गौतम का कहना है कि यह चुनाव स्थानीय स्तर पर लड़ रहे हैं और पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रचार में लगे हैं। 2021 में केजरीवाल और सिसोदिया ने इन सीटों पर सक्रियता दिखाई थी, लेकिन इस बार शीर्ष नेताओं का प्रचार से दूर रहना पार्टी के लिए चिंता का विषय बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपचुनाव का परिणाम बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह 27 साल बाद सत्ता में वापसी का संकेत हो सकता है। वहीं, आम आदमी पार्टी के नेताओं की दूरी और प्रचार में कमी से पार्टी को नुकसान हो सकता है। दिल्ली की राजनीति में इस चुनाव का असर आगामी विधानसभा चुनावों पर भी पड़ेगा, इसलिए दोनों पक्ष इस चुनाव को अपनी-अपनी रणनीति के तहत देख रहे हैं।










