दिल्ली सरकार के भ्रष्टाचार मामले में जांच का दायरा बढ़ रहा है
दिल्ली सरकार की सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) में सामने आए भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच अब केवल खरीद प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गई है। एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) की जांच अब उन डॉक्टरों और तकनीकी विशेषज्ञों पर भी केंद्रित हो गई है, जो विभिन्न मेडिकल उपकरणों के लिए तकनीकी मानकों (स्पेसिफिकेशन) तय करने वाली समितियों का हिस्सा थे।
डॉक्टरों और विशेषज्ञों की भूमिका भी हो रही है जांच के दायरे में
सूत्रों के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग के लगभग 19 विभागों के डॉक्टर इस प्रक्रिया से जुड़े हुए थे। इनमें एनस्थीसिया, बायोकैमिस्ट्री, पैथोलॉजी, गायनेकोलॉजी, रेडियोलॉजी, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और कार्डियोलॉजी जैसे विभाग शामिल हैं। इन विशेषज्ञ डॉक्टरों का जिम्मा था आवश्यक उपकरणों और सामग्री की तकनीकी विशिष्टताएँ तय करना।
स्पेसिफिकेशन कमेटी क्या है और क्यों हो रही है इसकी जांच?
जनरल फाइनेंशियल रूल्स (GFR) 2017, वित्त मंत्रालय के मैनुअल, GeM गाइडलाइंस और केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, सरकारी खरीद की प्रक्रिया की शुरुआत स्पेसिफिकेशन कमेटी से होती है। इस कमेटी का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी मानक निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने वाले हों। नियमों के अनुसार, इन मानकों को किसी विशेष कंपनी या ब्रांड को लाभ पहुंचाने के लिए नहीं बनाया जाना चाहिए। कमेटी का कार्य सिर्फ आवश्यकताओं का आकलन और तकनीकी मानकों को तय करना है, ताकि अधिक से अधिक योग्य विक्रेता टेंडर प्रक्रिया में भाग ले सकें।
हालांकि, जांच में पाया गया है कि कुछ मामलों में तकनीकी स्पेसिफिकेशन इस तरह से तैयार किए गए कि प्रतिस्पर्धा सीमित हो गई और कुछ चुनिंदा विक्रेताओं को फायदा पहुंचा। आरोप है कि कुछ विक्रेताओं को पहले से ही तकनीकी आवश्यकताओं की जानकारी थी, जिससे वे अपने उत्पाद और दस्तावेज उसी अनुसार तैयार कर सके। सूत्रों का कहना है कि इन डॉक्टरों का संपर्क कई ऐसे विक्रेताओं से था, जिन्हें सीधे तौर पर डॉक्टरों की मिलीभगत से फायदा पहुंचाया गया। इन विक्रेताओं को पहले से ही स्पेसिफिकेशन दी गई या उनके अनुसार स्पेसिफिकेशन तैयार की गई, ताकि कोई दूसरा विक्रेता मुकाबला न कर सके। इस कारण एंटी करप्शन ब्रांच इन विक्रेताओं से भी पूछताछ कर रही है।
यदि जांच में इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह GFR और CVC के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन माना जाएगा, जिनमें निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और समान अवसर प्रदान करने की बात कही गई है।
वेंडर्स पर भी बढ़ रही है एंटी करप्शन ब्रांच की नजर
एंटी करप्शन ब्रांच अधिकारी और डॉक्टरों के साथ-साथ उन विक्रेताओं से भी पूछताछ कर रहे हैं, जिन्होंने इन खरीद प्रक्रियाओं से लाभ उठाया है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि क्या टेंडर जारी होने से पहले कोई गोपनीय जानकारी साझा की गई थी या नहीं। साथ ही, यह भी जांच की जा रही है कि क्या तकनीकी मानक किसी विशेष उत्पाद या कंपनी को ध्यान में रखकर बनाए गए थे।
खरीद प्रक्रिया में जिम्मेदारियां और नियम
सरकारी खरीद नियमों के अनुसार, स्पेसिफिकेशन कमेटी केवल तकनीकी मानक तय करती है। इसके बाद GeM बिड कमेटी टेंडर प्रकाशित करती है, टेक्निकल इवैल्यूएशन कमेटी तकनीकी योग्यता की जांच करती है और प्राइस बिड कमेटी वित्तीय प्रस्तावों का मूल्यांकन करती है। नियम स्पष्ट करते हैं कि कोई भी एक व्यक्ति या अधिकारी अकेले इन प्रक्रियाओं का संचालन नहीं कर सकता, ताकि हितों का टकराव न हो और प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।
गौरतलब है कि GFR 2017 की धाराओं 144, 149, 162 और 173 से 177 तक में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही पर जोर दिया गया है। साथ ही CVC के दिशा-निर्देश भी स्पष्ट करते हैं कि किसी एक विक्रेता के पक्ष में प्रतिबंधात्मक स्पेसिफिकेशन तैयार करना गंभीर गड़बड़ी माना जा सकता है। इसलिए, अब जांच एजेंसियां न केवल खरीद आदेशों बल्कि उन शुरुआती चरणों पर भी ध्यान केंद्रित कर रही हैं, जहां तकनीकी मानक तय किए गए थे। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट हो सकेगा कि इन गड़बड़ियों की जड़ें किस स्तर तक फैली हुई हैं और किन-किन लोगों की भूमिका इसमें रही है।











