दिल्ली ब्लास्ट की जांच जारी, आतंकवाद का नया पहलू सामने
दिल्ली में हुए धमाके की जांच अभी भी जारी है, और दिनभर नए खुलासे हो रहे हैं। सरकार ने अब स्वीकार किया है कि यह हमला आतंकवादी गतिविधि का हिस्सा था। हालांकि, इस धमाके में पहलगाम (Kashmir) जैसी विदेशी आतंकवादी संगठनों की भागीदारी नहीं पाई गई है। इस संदर्भ में महाराष्ट्र से समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी ने जो विचार व्यक्त किए हैं, उन्हें पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने अपने तरीके से आगे बढ़ाया है। दोनों नेताओं की टिप्पणियों में समानता यह है कि वे आतंकवाद को परिस्थिति का परिणाम मान रहे हैं। इस बीच, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने आतंकवाद की जड़ें समझाते हुए कहा है कि यह एक मानसिक बीमारी है, न कि केवल अन्याय का परिणाम। जम्मू-कश्मीर में तैनात एसपी प्रणव महाजन ने स्पष्ट किया कि आतंकवाद का जन्म गरीबी या अन्य सामाजिक कारणों से नहीं, बल्कि मानसिक विकार से होता है।
आतंकवाद की उत्पत्ति पर राजनीतिक और सामाजिक बहस
अबू आजमी और चिदंबरम दोनों ने आतंकवाद की जड़ें समझाने का प्रयास किया है। अबू आजमी ने लखनऊ में कहा कि जब भी चुनाव आते हैं, इस तरह की घटनाएं होती हैं और इनकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आतंकियों को पकड़कर छह महीने के अंदर फांसी दी जानी चाहिए, जैसा कि मुंबई ट्रेन धमाके में निर्दोष लोगों को फंसाया गया था। उनका मानना है कि जुल्म और नाइंसाफी ही आतंकवाद को जन्म देता है। वहीं, चिदंबरम ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आतंकवाद दो तरह का होता है-विदेश से प्रशिक्षित और देश के भीतर से उभरने वाले। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार ने इन आतंकवादियों के खिलाफ चुप्पी साध रखी है, क्योंकि देश में ही पैदा होने वाले आतंकवादी भी मौजूद हैं। उनका तर्क है कि हमें यह समझना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियां क्या हैं जो पढ़े-लिखे नागरिकों को भी आतंकवादी बना देती हैं।
आतंकवाद का सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
प्रोफेशनल पुलिस अधिकारी प्रणव महाजन ने अपने जवाब में कहा कि आतंकवाद केवल भारत का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि यह विश्वव्यापी समस्या है। उन्होंने बताया कि मध्य पूर्व से लेकर यूरोप और अमेरिका तक, शिक्षित और सम्पन्न लोग भी इस रास्ते पर चल पड़े हैं। ओसामा बिन लादेन से लेकर यूरोप के हमलावरों तक, ये सभी गरीबी या उपेक्षा के शिकार नहीं थे, बल्कि जहरीली विचारधाराओं और मजहबी ब्रेनवॉश का शिकार थे। यह स्पष्ट है कि शिक्षा और आर्थिक समृद्धि आतंक से बचाव का गारंटी नहीं हैं। असली सवाल यह है कि वह कौन-सी ब्रेनवॉशिंग है जो इंसानों को यह यकीन दिलाती है कि वे मजहब या बदले के नाम पर निर्दोषों की जान ले सकते हैं। जब तक हम मजहबी आतंकवाद और उससे जुड़े ग्लोबल फंडिंग नेटवर्क का सामना नहीं करेंगे, तब तक यह समस्या जड़ से नहीं मिटेगी। यह नेटवर्क संगठित, अंतरराष्ट्रीय और फंडिंग से लैस है, जो निरंतर नए आतंकवादी पैदा कर रहा है। इसलिए, जरूरी है कि हम अपने समाज में बार-बार फूटने वाले इस वैचारिक गड्ढे को समझें और उससे निपटने के उपाय खोजें।











