छात्र आंदोलन का उदय: सोशल मीडिया से सड़क तक का सफर
एक विवादास्पद टिप्पणी से शुरू हुआ यह छात्र आंदोलन कुछ ही हफ्तों में व्यापक जनआंदोलन में बदल गया। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) के शनिवार को इस्तीफे के बाद, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके (Abhijeet Dipke) ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत (Chief Justice Suryakant) का धन्यवाद किया। असल में, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की सुनवाई के दौरान की गई उनकी ‘कॉकरोच’ टिप्पणी ने अनजाने में इस आंदोलन को एक प्रतीक प्रदान कर दिया, जिसे छात्रों ने अपनी पहचान बना लिया।
सोशल मीडिया का प्रभाव और आंदोलन का विस्तार
इसके बाद ‘कॉकरोच’ सोशल मीडिया पर आंदोलन का प्रमुख प्रतीक बन गया। सोशल मीडिया पर कॉकरोच वाले इमोजी की भरमार हो गई, और मीम्स, कार्टून व व्यंग्यात्मक पोस्टर तेजी से वायरल होने लगे। दिपके ने इसी प्रतीक का उपयोग कर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की शुरुआत की, जो पहले एक व्यंग्यात्मक सोशल मीडिया पेज था। धीरे-धीरे, यह पेज छात्र आंदोलन की मुख्य आवाज बन गया।
एक सोशल मीडिया अकाउंट बंद होने के बाद भी आंदोलन जारी रहा। नए अकाउंट का नाम था ‘Cockroach is Back’ और इसका नारा था- ‘कॉकरोच कभी नहीं मरते।’ इस आंदोलन ने सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक समर्थन प्राप्त किया, जिसमें इंस्टाग्राम पर इसके करीब 2.63 करोड़ फॉलोअर्स हैं, जबकि कांग्रेस के लगभग 1.48 करोड़ और बीजेपी के करीब 95 लाख फॉलोअर्स हैं।
सड़क पर पहली बार दिखा असर और व्यापक समर्थन
ऑनलाइन समर्थन के जमीन पर उतरने का पहला संकेत 6 जून को मिला, जब छात्रों ने जंतर-मंतर (Jantar Mantar) पर प्रदर्शन किया। इसके बाद देश के विभिन्न शहरों में इसी तरह के प्रदर्शन होने लगे। अलग-अलग कॉलेज समूहों और स्वयंसेवकों ने एकजुट होकर प्रदर्शन, चर्चा और जनसभाएं आयोजित कीं। 20 जून को आंदोलन ने नया मोड़ लिया, जब दिल्ली और अन्य राज्यों से बड़ी संख्या में छात्र जंतर-मंतर पहुंचे। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने वहां से जाने से इनकार कर दिया, और यह प्रदर्शन 24 घंटे का धरना बन गया।
बाद में वामपंथी छात्र संगठनों जैसे AISA, AISF, SFI, KYS ने भी इस धरने में भाग लिया। प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन, पानी और चिकित्सा सुविधाओं का प्रबंध किया गया। कई लोग कुछ घंटों या एक रात ही धरना स्थल पर बिताकर वापस लौट गए।
28 जून को सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) के आंदोलन में शामिल होने के बाद इसे और व्यापक समर्थन मिला। वांगचुक ने छह छात्र कार्यकर्ताओं के साथ भूख हड़ताल शुरू की, जिससे आंदोलन का दायरा विश्वविद्यालय से बाहर निकलकर आम जनता तक पहुंच गया। इसके बाद अनेक हस्तियां, जैसे शिक्षक, वकील, कलाकार और रिटायर्ड अधिकारी भी जंतर-मंतर पहुंचने लगे।
पुलिस की कार्रवाई और वांगचुक की अस्पताल में भर्ती होने की तस्वीरों ने आंदोलन को और तेज कर दिया। विपक्षी दलों, NGOs और सेलेब्रिटीज ने इन घटनाओं पर सवाल उठाए। 20 जुलाई को संसद मार्च का आयोजन हुआ, जिसमें भारी बैरिकेडिंग के बावजूद हजारों छात्र संसद की ओर बढ़े। पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का प्रयोग किया, लेकिन प्रदर्शनकारी डटे रहे। इन घटनाओं का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं, जिससे मुंबई, इंदौर, नागपुर, कोलकाता जैसे शहरों में भी प्रदर्शन शुरू हो गए।
इस आंदोलन की खास बात इसकी भाषा थी-मीम्स, व्यंग्य, पुलिस कर्मियों को फूल देना और उनके साथ सेल्फी लेना। महात्मा गांधी की दांडी यात्रा, डॉ. भीमराव आंबेडकर, भगत सिंह और संविधान को आंदोलन के प्रतीक माना गया। पुलिस बैरिकेड के सामने राष्ट्रगान गाना, कविताएं पढ़ना और बॉलीवुड गानों पर नाचना भी इस आंदोलन का हिस्सा रहा।
आंदोलन का स्वतंत्र स्वरूप और राजनीतिक प्रभाव
आंदोलन के अंतिम चरण तक यह किसी एक नेता या संगठन के नियंत्रण से बाहर हो चुका था। जंतर-मंतर पहुंचने वाले अधिकतर लोग पहले न तो अभिजीत दिपके से मिले थे और न ही CJP से सीधे संपर्क में थे। वे सोशल मीडिया पर वीडियो देखने, सोनम वांगचुक के हेल्थ अपडेट और पुलिस कार्रवाई की तस्वीरों के आधार पर जुड़ रहे थे। इस आंदोलन को किसी एक संगठन के बजाय स्वतंत्र रूप से काम कर रहे लोगों ने आगे बढ़ाया।
जो लोग दिल्ली नहीं पहुंच सकते थे, वे ऑनलाइन प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन और जरूरी सामान भेज रहे थे। कंटेंट क्रिएटर्स, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया प्रभावशाली व्यक्तियों ने भी जंतर-मंतर से जुड़े घटनाक्रम को अपने प्लेटफॉर्म पर प्रसारित किया।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही इस आंदोलन ने अपनी पहली बड़ी राजनीतिक जीत हासिल कर ली। यह शुरुआत एक तंज से हुई, लेकिन सत्ता को हिला देने वाले इस आंदोलन ने भारतीय छात्र राजनीति के इतिहास में एक मिसाल कायम कर दी है। ‘कॉकरोच’ टिप्पणी से शुरू होकर प्रधान के इस्तीफे तक पहुंचने वाला यह सफर दर्शाता है कि सोशल मीडिया पर शुरू हुआ अभियान किस तरह बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है और वह भी बिना किसी संगठनात्मक नियंत्रण के।











