बिहार चुनाव में कांग्रेस की स्थिति और चुनौतियां
कई दशकों से बॉलीवुड की एक फिल्म में ऐसा गीत आया था, जिसमें आज की कांग्रेस संगठन और उसके नेताओं का प्रतिबिंब नजर आता है। उस गीत की पंक्ति है, “आग लगी हमरी झोपड़िया में, हम गाएं मल्हार…”। यह वाक्य उस विडंबना को दर्शाता है, जब संकट की आग भड़क रही हो और व्यक्ति फिर भी बेपरवाह होकर गीत गा रहा हो। वर्तमान में बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस की स्थिति भी कुछ ऐसी ही प्रतीत हो रही है। एक ओर पार्टी में टिकट बंटवारे और सीट शेयरिंग को लेकर घमासान मचा हुआ है, वहीं दूसरी ओर, पार्टी के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी दिवाली के मौके पर मिठाइयां बनाते हुए जनता से संवाद कर रहे हैं।
बिहार चुनाव में कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन क्यों?
बिहार की 243 सीटों पर एनडीए (BJP, JDU, LJP-RV, HAM-S) ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है, और सीट बंटवारे का फॉर्मूला भी लगभग तय हो चुका है। जेडीयू और बीजेपी ने 101-101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि चिराग पासवान की पार्टी को 29 सीटें मिली हैं। वहीं, महागठबंधन (RJD, कांग्रेस, वाम दल, VIP) का हाल अभी भी अनिश्चित है। नामांकन की अंतिम तिथि बीत चुकी है, लेकिन सीट शेयरिंग का फॉर्मूला अभी तक फाइनल नहीं हो पाया है। इस कारण कई क्षेत्रों में गठबंधन के घटक दलों ने एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर कांग्रेस और RJD के बीच छह सीटों पर सीधी टक्कर हो रही है, जबकि वाम दलों के साथ भी चार सीटों पर मुकाबला है। यह स्थिति बीजेपी के लिए फायदे का संकेत है, क्योंकि इन सीटों पर उनके उम्मीदवारों को बढ़त मिल सकती है।
कांग्रेस में आंतरिक कलह की जड़ें
कांग्रेस में इस विवाद की शुरुआत 2020 के चुनावों से हुई, जब महागठबंधन में पार्टी को महज 70 सीटें मिली थीं, जबकि RJD ने 144 पर चुनाव लड़ा था। उस समय कांग्रेस के 19 विधायक जीते थे, लेकिन इस बार पार्टी अधिक महत्वाकांक्षी हो गई है। राहुल गांधी के करीबी कृष्णा अल्लावरू को बिहार का प्रभारी बनाया गया, जिन्होंने वोटर अधिकार यात्रा और कन्हैया कुमार की पलायन रोक यात्रा के माध्यम से पार्टी को मजबूत करने का प्रयास किया। लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर उन्होंने कड़ा रुख अपनाया। कांग्रेस ने 70 से घटाकर 60-61 सीटें मांगीं, परंतु कुछ क्षेत्रों में पार्टी अड़ गई। आरजेडी ने इन्हें अपनी हिस्सेदारी माना, जबकि छोटे सहयोगी जैसे मुकेश साहनी की VIP ने भी 60 सीटों का दावा किया। परिणामस्वरूप, नामांकन के अंतिम दिन तक पार्टी ने 48 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की, जबकि RJD ने 143 उम्मीदवारों का ऐलान किया। इस बीच, पार्टी के अंदर ही गहरे मतभेद उभर कर सामने आए हैं।
राहुल गांधी का बिहार में सक्रियता और चुनौतियां
राहुल गांधी ने शुरू में बिहार चुनाव के दौरान काफी उत्साह दिखाया था। अगस्त 2025 में वोटर अधिकार यात्रा में वे तेजस्वी यादव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे। इस यात्रा ने युवाओं और प्रवासियों के मुद्दों को प्रमुखता दी, और बेरोजगारी तथा मतदाता सूचियों में गड़बड़ी को लेकर बीजेपी-जेडीयू पर हमला बोला। इसके बाद, कन्हैया कुमार की यात्रा ने कांग्रेस में नई ऊर्जा का संचार किया। लेकिन सितंबर के बाद से तस्वीर बदलने लगी। राहुल विदेश यात्रा पर चले गए, जहां दक्षिण अमेरिका में 15 दिन बिताए। वापस लौटने के बाद उन्होंने हरियाणा और उत्तर प्रदेश पर ध्यान केंद्रित किया। दिवाली के मौके पर उन्होंने घंटेवाला मिठाई दुकान पर जाकर मिठाइयां बनाते हुए वीडियो साझा किया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस वीडियो के जरिए वे जनता से पूछ रहे थे कि आपकी दिवाली कैसी गुजर रही है। हालांकि, यह वीडियो बिहार चुनाव के संदर्भ में मीम्स का विषय बन गया। बीजेपी नेताओं ने तंज कसा कि राहुल विदेश घूम रहे हैं, देश में नहीं आ रहे हैं।
बिहार से राहुल गांधी क्यों गायब हैं?
बिहार में राहुल गांधी की अनुपस्थिति के कई कारण हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी की कमजोर स्थिति और महागठबंधन में आरजेडी का प्रभुत्व राहुल को बिहार में सक्रिय रहने से रोक रहा है। पार्टी चाहती है कि तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया जाए, लेकिन कांग्रेस ने बार-बार इनकार किया है। इसके अलावा, पार्टी के अंदर ही दबाव है कि वे कम से कम 60 सीटों पर चुनाव लड़ें, लेकिन आरजेडी इससे सहमत नहीं है। राहुल गांधी खुद भी एक अलग छवि बनाने में लगे हैं, जिसमें वे जनता के बीच एक सामान्य नेता की तरह दिखना चाहते हैं। इस कारण वे बिहार की जमीनी राजनीति से दूर हो रहे हैं। साथ ही, कांग्रेस को डर है कि हाईकमान का हस्तक्षेप स्थिति को और बिगाड़ सकता है, जैसा कि 2015 के महागठबंधन के समय हुआ था। सोनिया गांधी के वीडियो कॉन्फ्रेंस में हस्तक्षेप और सीटों के पुराने परिवारों को मौका देने के फैसले ने तेजस्वी को नाराज कर दिया। इन सब कारणों से राहुल गांधी बिहार चुनाव में सक्रियता से दूर हैं, और पार्टी की स्थिति भी कमजोर होती जा रही है।











