उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की चुनावी रणनीति का विस्तार
राहुल गांधी की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र अब बिहार से उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ रहा है। जब बिहार में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी, उसी समय राहुल गांधी ने गुजरात में कांग्रेस के जिलाध्यक्षों के साथ मास्टरक्लास का आयोजन किया। इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश में चुनावी तैयारी के तहत पचमढ़ी का दौरा किया और वहां भी पार्टी के नेताओं को जीत के टिप्स दिए। अभी बिहार के चुनाव खत्म भी नहीं हुए हैं कि राहुल गांधी का ध्यान उत्तर प्रदेश पर केंद्रित हो गया है।
उत्तर प्रदेश में भी राहुल गांधी की नजर ओबीसी और दलित वोटरों पर टिकी हुई है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी रणनीति बिहार चुनाव जैसी ही होगी, जिसमें सामाजिक न्याय और जातीय मुद्दों को प्रमुखता दी जाएगी। हालाँकि, यूपी में भी राहुल गांधी के दौरे और संवाद कार्यक्रम जारी रहेंगे, लेकिन उनका मुख्य फोकस अब पूरी तरह से उत्तर प्रदेश पर है।
यूपी में राहुल गांधी की आगामी योजनाएं और चुनावी तैयारी
उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के अभियान का उद्देश्य ओबीसी और दलित समुदाय के वोटरों से सीधे जुड़ना है। इसके लिए यूपी कांग्रेस मंडल स्तर पर संवाद कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बना रही है, जो नवंबर के अंत या दिसंबर के शुरुआत में शुरू हो सकते हैं। इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना जैसे मुद्दों को उजागर करना है, और राहुल गांधी स्वयं इन कार्यक्रमों का नेतृत्व करेंगे।
2025 में राहुल गांधी का दरभंगा में दलित छात्रों से मिलने का कार्यक्रम भी तय था, लेकिन प्रशासन की अनुमति न मिलने के कारण वह नहीं हो पाया। इसके अलावा, कांग्रेस की ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा भी चल रही है, जिसमें नेता कन्हैया कुमार और राहुल गांधी शामिल हुए। इन प्रयासों का मकसद यूपी के ओबीसी और दलित वोटरों के साथ मजबूत कनेक्शन बनाना है।
क्या यूपी में राहुल गांधी की रणनीति बिहार जैसी सफल होगी?
उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की रणनीति का मुख्य लक्ष्य समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के साथ तालमेल बिठाना है। हालांकि, बिहार में तेजस्वी यादव के साथ मिलकर वोटर अधिकार यात्रा जैसी सफल पहल हुई थी, लेकिन यूपी में भी वही सफलता मिल पाएगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
यूपी में राहुल गांधी के पास कोई अतिरिक्त सहयोगी जैसे कन्हैया कुमार या पप्पू यादव नहीं हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय भी प्रभावशाली नेता नहीं माने जाते। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी की चुनावी मुहिम बिहार जैसी ही सफलता हासिल कर पाएगी। साथ ही, यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव राहुल गांधी को तेजस्वी यादव की तरह स्वीकार कर पाएंगे।










