बिहार विधान परिषद चुनाव में निर्विरोध जीत का इतिहास
बिहार में हाल ही में हुए विधान परिषद चुनाव में सभी नौ सीटों पर मतदान नहीं हुआ, क्योंकि उम्मीदवारों की संख्या सीटों से मेल खाती थी। इस कारण इन सीटों पर कोई मुकाबला नहीं हुआ और सभी उम्मीदवार निर्विरोध विजेता घोषित किए गए। इसे सामान्य भाषा में ‘निर्विरोध निर्वाचित’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि बिना मतदान के ही उम्मीदवार जीत गए। इस चुनाव में नौ में से आठ सीटें सत्ताधारी एनडीए (BJP, JDU, LJP) ने जीतीं, जबकि एक सीट विपक्षी पार्टी RJD के खाते में गई।
मुख्य विजेताओं और राजनीतिक समीकरण
एनडीए की ओर से चार उम्मीदवारों ने जीत हासिल की, जिनमें भोजपुरी सुपरस्टार पवन सिंह, भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया को-इन-चार्ज संजय मयूख, अनिल ठाकुर और शीला पांडे शामिल हैं। खास बात यह है कि पवन सिंह ने 2024 में भाजपा छोड़ दी थी, लेकिन एक साल बाद ही वापस लौटकर अब MLC बन गए हैं। भाजपा के पास पहले इन नौ में से केवल दो सीटें थीं, जो अब बढ़कर चार हो गई हैं। दूसरी ओर, JDU को तीन सीटें मिलीं, जिनमें स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार, भारती मेहता और शिवरानी देवी प्रजापति शामिल हैं। LJP (राम विलास) ने पहली बार अपने इतिहास में एक MLC जीता है, अशरफ अंसारी के रूप में। RJD को एक सीट मिली, जिसमें सुनील कुमार सिंह लगातार तीसरी बार MLC चुने गए हैं।
जाति, उम्मीदवार और राजनीतिक संकेत
बिहार की राजनीति में जाति का महत्व बहुत अधिक है। इस बार भाजपा ने जानबूझकर मिलाजुला चुनाव रणनीति अपनाई, जिसमें पवन सिंह और संजय मयूख ऊंची जाति से हैं, जो भाजपा का मजबूत वोटबैंक हैं। वहीं, अनिल ठाकुर और शीला पांडे जैसे उम्मीदवार अति पिछड़ा वर्ग (EBC) से हैं। जदयू ने भी इसी तरह का समीकरण अपनाया, जिसमें भारती मेहता EBC और शिवरानी देवी प्रजापति OBC वर्ग से हैं। उल्लेखनीय है कि पवन सिंह खुद चुनाव में नहीं आए, बल्कि उनके छोटे भाई ने जीत का प्रमाणपत्र प्राप्त किया।











