मुजफ्फरपुर में बांसुरी बनाने का पारंपरिक व्यवसाय जीवित
भगवान श्रीकृष्ण और बांसुरी का संबंध सदियों से गहरा रहा है। जैसे ही जन्माष्टमी का त्योहार नजदीक आता है, कान्हा की मूर्तियों और पोशाक के साथ-साथ बांसुरी की खरीदारी भी तेज हो जाती है। इस मांग को पूरा करने के लिए मुजफ्फरपुर (Muzaffarpur) के एक गांव में सदियों से चली आ रही कला आज भी जीवित है। खास बात यह है कि अब इस पारंपरिक व्यवसाय में घर की महिलाएं भी सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं।
बांसुरी बनाने वाले गांव की परंपरागत विरासत और महिलाओं की भूमिका
मुजफ्फरपुर जिले के कुढ़नी प्रखंड की सुमेरा पंचायत के बड़ा सुमेरा स्थित मुर्गियाचक गांव को बांसुरी बनाने वाले कारीगरों का गढ़ माना जाता है। यहां लगभग 80 मुस्लिम परिवार पीढ़ियों से इस कला से जुड़े हैं। त्योहारों का मौसम इन कारीगरों के लिए अपने कारोबार को बढ़ाने और अतिरिक्त आय अर्जित करने का अच्छा अवसर लाता है।
जन्माष्टमी और दशहरा जैसे त्योहारों से पहले घर-घर में बांसुरी बनाने का काम तेज हो जाता है। महिलाएं घर पर बांसुरी और पारंपरिक सामान तैयार करती हैं, जबकि पुरुष सदस्य इन्हें बाजारों और शहरों में पहुंचाते हैं। इस तरह से यह पारंपरिक हुनर अब परिवार की महिलाओं के लिए भी रोजगार का जरिया बन चुका है।
सरकारी सहायता से बढ़ी पारंपरिक कला की संभावनाएं
मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत मिली 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता ने इन परिवारों के पारंपरिक व्यवसाय को नई ऊर्जा दी है। कई महिलाओं ने इस सरकारी मदद को घरेलू खर्च के बजाय कारोबार में निवेश किया है। इससे बांस और अन्य आवश्यक कच्चे माल की खरीद आसान हो गई है, जिससे उत्पादन में वृद्धि हो रही है।
अख्तरी खातून जैसी महिला कारीगर बताती हैं कि पहले पैसे की कमी उनके व्यवसाय के विस्तार में बाधा थी। अब सरकारी सहायता से वे बांसुरी के साथ-साथ खिलौने और पंखे बनाने के लिए भी सामग्री खरीद पा रही हैं। घर की महिलाएं इन उत्पादों को तैयार करती हैं और पुरुष सदस्य इन्हें बाजारों में बेचने का काम करते हैं।
रिजवान खातून का कहना है कि उनका परिवार पहले से ही बांसुरी बनाने का काम कर रहा है। योजना से मिली मदद ने उन्हें इस पारंपरिक व्यवसाय को आगे बढ़ाने का अवसर दिया है। अब वे बिना कर्ज के अपनी छोटी पूंजी से उत्पादन बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। महिलाओं की भागीदारी से परिवार का आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है।
गांव के बुजुर्ग कारीगर मोहम्मद आलम करीब 40 वर्षों से बांसुरी बना रहे हैं। उन्होंने यह हुनर अपने पिता से सीखा था, जिन्होंने भी बाहर से आए एक कारीगर से यह कला सीखी थी। समय के साथ बाजार की स्थिति बदली, प्लास्टिक के खिलौनों ने पारंपरिक वस्तुओं की जगह ले ली, लेकिन इन कारीगरों ने अपने पुश्तैनी हुनर को नहीं छोड़ा। आज भी लगभग 80 परिवार इस व्यवसाय से अपनी जीविका चला रहे हैं।
जन्माष्टमी के दौरान इन कारीगर परिवारों का काम खास महत्व रखता है। त्योहार से पहले ही वे हजारों रुपये का माल तैयार कर लेते हैं, जिसे वे आसपास के जिलों और शहरों में बेचते हैं। मुजफ्फरपुर के अलावा समस्तीपुर, रोसड़ा, जयनगर, राजनगर, खजौली, ससनपुर और मुसरीघरारी जैसे इलाकों में भी इन बांसुरीयों की बिक्री होती है। पारंपरिक तरीके से नरकट और बांस का इस्तेमाल कर बनाई गई इन बांसुरी की कीमत 10 से 50 रुपये के बीच होती है।
त्योहारों के दौरान बढ़ती मांग इन परिवारों के लिए मुख्य आय का स्रोत बन जाती है। जन्माष्टमी और दशहरा जैसे त्योहार इन व्यवसायों को नई गति देते हैं। घरों में लगातार उत्पादन चलता रहता है ताकि बाजार की जरूरतें पूरी हो सकें।
बांसुरी न केवल एक पारंपरिक कला है, बल्कि यह 80 से अधिक परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया भी है। इन परिवारों के लिए यह कला भगवान कृष्ण से जुड़ी आस्था का प्रतीक होने के साथ-साथ आर्थिक स्थिरता का भी माध्यम बन गई है। सरकारी सहायता और महिलाओं की भागीदारी ने इस पारंपरिक व्यवसाय में नई उम्मीद जगा दी है। अब घर की महिलाएं उत्पादन में हाथ बंटाने के साथ-साथ कच्चे माल की खरीद में भी सक्रिय हैं, जिससे बिना अतिरिक्त कर्ज के व्यवसाय को आगे बढ़ाया जा रहा है।
जन्माष्टमी से पहले मुजफ्फरपुर के मुर्गियाचक में फिर से बांसुरी की धुन सुनाई देने लगी है। कारीगर परिवारों को उम्मीद है कि इस बार बिक्री बेहतर होगी और त्योहार उनके घरों में खुशहाली लेकर आएगा। सदियों से चली आ रही इस कला को महिलाओं की नई भागीदारी और सरकारी मदद ने एक नई दिशा दी है।










