लखीसराय में मिली जिंदा बच्ची की चौंकाने वाली कहानी
लखीसराय (Lakhisarai) से सामने आई यह घटना मानवता, भाग्य और आश्चर्यजनक घटनाओं की एक अनूठी मिसाल है, जिसे सुनकर हर कोई भावुक हो सकता है। यह कहानी उस मासूम बच्चे की है, जिसे उसके अपने ही पिता ने मृत मान लिया था। लेकिन ऊपर वाले की इच्छा कुछ और ही थी।
मॉर्निंग वॉक के दौरान मिली जिंदा बच्ची
18 अप्रैल की सुबह, किऊल नदी (Kuil River) के पुराने रेलवे पुल के पास रोज की तरह कुछ लोग वॉक पर निकले थे। वातावरण शांत और ठंडी हवा चल रही थी। तभी अचानक किसी ने बच्चे के रोने की आवाज सुनी। शुरुआत में लोगों ने इसे अनदेखा किया, लेकिन जब आवाज लगातार आने लगी, तो वे उस दिशा में बढ़े।
जो उन्होंने देखा, वह किसी के भी दिल को झकझोर देने वाला था। पुल के नीचे, नदी के किनारे एक कमजोर हालत में बच्ची रो रही थी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए। तुरंत ही उन्होंने पुलिस को सूचित किया, लेकिन जब मदद देर से पहुंची, तो उन्होंने खुद ही मानवता का परिचय देते हुए बच्चे की देखभाल शुरू कर दी।
बच्चे का इलाज और चौंकाने वाली सच्चाई
मौके पर मौजूद लोगों ने उस बच्ची को तुरंत ही लखीसराय के सदर अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टरों ने उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे बेहतर इलाज के लिए आईजीएमएस (IGMS) पटना रेफर कर दिया। जैसे ही सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीरें और खबरें वायरल हुईं, तो पिता को भी जानकारी हो गई।
पता चला कि यह बच्ची जमुई (Jamui) जिले के अंबा गांव (Amba Village) का दो साल 21 दिन का बेटा था। पिता ने बताया कि बच्चे को जन्म से ही गंभीर बीमारी थी। जन्म के समय उसका मलद्वार सही से विकसित नहीं था, जिसके इलाज के लिए उन्होंने पटना के एक निजी अस्पताल में करीब 1 लाख 20 हजार रुपये खर्च किए थे।
कुछ समय बाद सर्जरी के टांके खुल गए और बच्चे की हालत फिर बिगड़ने लगी। पिता 18 अप्रैल को बच्चे का इलाज कराने पत्नी के साथ पटना जा रहे थे, तभी उन्हें लगा कि बच्चे की सांसें रुक गई हैं। पिता ने मान लिया कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा।
इसके बाद उन्होंने एक स्थानीय व्यक्ति को 500 रुपये देकर बच्चे का अंतिम संस्कार कर दिया। परंपरा के अनुसार, पिता अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होते हैं, इसलिए वह श्मशान घाट नहीं गए। बच्चे को सौंपने के बाद, वे घर लौट गए और गांव में अंतिम संस्कार की क्रियाएं पूरी कर दीं।
लेकिन उस दिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अगले दिन जब मॉर्निंग वॉक कर रहे लोग उस मासूम की रोने की आवाज सुनते हैं, तो एक नई जिंदगी वापस लौट आई। यदि थोड़ी देर और इंतजार किया गया होता, तो यह कहानी शायद कुछ और ही होती।
इस घटना के बाद, परिवार ने अपने गांव में बच्चे का श्राद्ध और मुंडन संस्कार भी कर दिया था। घर में मातम पसरा था, लेकिन तीन दिन बाद जब सच्चाई सामने आई, तो सभी खुशी और हैरानी से भर गए।
पिता तुरंत ही लखीसराय पहुंचे और अपने जिंदा बेटे को देखा। यह पल किसी चमत्कार से कम नहीं था—जिसे मृत मान लिया गया था, वह फिर से जीवित था। अब बच्चे का इलाज पटना के आईजीएमएस अस्पताल में चल रहा है। बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष ने कहा कि ‘जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय’ की कहावत इस घटना में पूरी तरह साबित हुई है।
डॉक्टरों के अनुसार, बच्चे की स्थिति अभी नाजुक थी, लेकिन समय पर इलाज मिलने से उसकी जान बच गई। अब उसे बेहतर मेडिकल देखभाल दी जा रही है और उम्मीद है कि वह पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगा।









