भारतीय राजनीति में बीजेपी का ‘सरप्राइज’ रणनीति का विश्लेषण
भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने ‘सरप्राइज’ प्रयोगों का ऐसा जाल बिछाया है कि यह किसी जादूगर की कला से कम नहीं लगती। जहां एक ओर जादूगर अपने टोपी से खरगोश निकालता है, वहीं बीजेपी अपने पर्चियों से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का चयन कर दर्शकों को चकित कर देती है। बिहार में भी इस परंपरा का एक नया अध्याय देखने को मिला, जब सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त किया गया। यह कदम पार्टी की परंपरागत रणनीति से अलग था, जिसमें अक्सर नामी चेहरे ही आगे आते हैं। इस बार बीजेपी ने अपने राजनीतिक ‘सरप्राइज’ का ताना-बाना बुनते हुए, किसी भी पूर्वानुमान को तोड़ते हुए, सीधे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री पद पर बिठाया।
बीजेपी की ‘सरप्राइज’ नीति का इतिहास और बिहार का अनूठा फैसला
पिछले वर्षों में बीजेपी ने मुख्यमंत्री चयन के मामले में कई बार अपने ‘सरप्राइज पैकेज’ से राजनीतिक माहौल को हिला दिया है। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में भी पार्टी ने ऐसे ही अप्रत्याशित फैसले लिए, जिनसे राजनीतिक विश्लेषक भी चौंक गए। उदाहरण के तौर पर मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को फिर से मुख्यमंत्री बनाने की उम्मीद थी, लेकिन पार्टी ने मोहन यादव को चुना। राजस्थान में भी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बजाय भजनलाल शर्मा को मौका दिया गया। छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साय का नाम सामने आया। इन फैसलों का मुख्य उद्देश्य था कि पार्टी अपने संगठनात्मक प्रयोगों से राजनीतिक माहौल को नया मोड़ दे।
बिहार में सम्राट चौधरी का चयन और इसकी रणनीतिक महत्ता
बिहार में जब सम्राट चौधरी का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए सामने आया, तो अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इसे ‘अफवाह’ मान रहे थे। क्योंकि सामान्यतः बीजेपी में डिप्टी सीएम या होम मिनिस्टर ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार होते हैं। लेकिन इस बार पार्टी ने अपने परंपरागत रुख को तोड़ते हुए, सीधे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। इस निर्णय में शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी भी खास थी, जिन्होंने मध्यप्रदेश में अपनी जीत के बावजूद खुद मुख्यमंत्री नहीं बन सके। बिहार में इस ‘सरप्राइज’ का अर्थ था कि बीजेपी अपने संगठनात्मक प्रयोगों से राजनीतिक संकेत देना चाहती है कि वह किसी भी समय अपने फैसले बदल सकती है।










