तुलसीदास जी की भक्ति और दिव्य संकेत
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, तुलसीदास जी का जीवन पूरी तरह से राम भक्ति में डूबा हुआ था। वे प्रतिदिन कथा करते, राम नाम जपते और प्रेम तथा भक्ति का संदेश फैलाते। उनके हृदय में एक गहरी इच्छा थी कि काश, उन्हें एक बार प्रभु श्रीराम का साक्षात दर्शन प्राप्त हो जाए। वे जानते थे कि केवल भक्ति और तपस्या से ही भगवान प्रसन्न होते हैं।
प्रेत से मिली दिव्य चेतावनी और मार्गदर्शन
तुलसीदास जी शौच के बाद अपने कमंडल का पानी एक पेड़ के पास फेंकते थे, जहां एक प्रेत (भूत) का वास था। प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, उस प्रेत ने एक दिन तुलसीदास जी से कहा कि इस पानी से उसकी बहुत सेवा हुई है और अब वह कुछ देना चाहता है। तुलसीदास जी ने कहा कि उन्हें केवल अपने श्रीराम के दर्शन ही चाहिए। तब प्रेत ने बताया कि उनकी भक्ति सच्ची है, पर श्रीराम के दर्शन सीधे नहीं होंगे। पहले उनके सच्चे भक्त हनुमान जी से मिलना जरूरी है।
हनुमान जी का दर्शन और श्रीराम का साक्षात्
प्रेत ने तुलसीदास जी को मार्ग दिखाया कि हनुमान जी हर दिन कथा में आते हैं, लेकिन किसी को पहचान में नहीं आते। वे एक वृद्ध, कुरूप और सामान्य मनुष्य के रूप में रहते हैं, जो सबसे पहले आते हैं और सबसे अंत में जाते हैं। अगले दिन तुलसीदास जी ने कथा में देखा कि एक वृद्ध व्यक्ति सबसे पहले आया और अंत तक शांत बैठा रहा। उन्हें प्रेत की बात याद आई और हृदय में कंपन हुआ। कथा समाप्त होने के बाद, उन्होंने उस वृद्ध के पीछे जाकर पूछा कि क्या वह साधारण व्यक्ति नहीं हैं। तभी वह वृद्ध मुस्कुराए और अपने दिव्य रूप में प्रकट हुए, और स्वयं हनुमान जी उनके सामने खड़े थे। तुलसीदास जी के नेत्रों से आंसू बह निकले और वे चरणों में गिर पड़े।
श्रीराम से मिलवाने का मार्ग और कथा का सत्य
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, हनुमान जी ने तुलसीदास जी से कहा कि उनकी भक्ति से वे प्रसन्न हैं। अब उन्हें चित्रकूट जाना चाहिए, जहां प्रभु श्रीराम स्वयं दर्शन देंगे। हनुमान जी ने यह भी बताया कि भक्ति का मार्ग केवल पूजा या शब्दों से नहीं, बल्कि सेवा, विनम्रता और सत्यता से खुलता है। तुलसीदास जी ने हनुमान जी का आशीर्वाद लिया और चित्रकूट की ओर चल पड़े। वहीं मंदाकिनी तट पर उन्हें श्रीराम और लक्ष्मण के साक्षात दर्शन हुए। प्रेमानंद जी का मानना है कि जहां सच्चे मन से राम कथा होती है, वहां हनुमान जी किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित रहते हैं। यह कथा तुलसीचरित, भक्तमाल और रामचरितमानस जैसी ग्रंथों में मिलती है।











