सादगीपूर्ण विवाह का नया पहलू: गायत्री शक्तिपीठ का प्रयास
समाज में दिखावे और फिजूलखर्ची के कारण होने वाली सामाजिक बुराइयों से निपटने के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के गायत्री शक्तिपीठ ने एक अनूठा कदम उठाया है। इस शक्तिपीठ ने संस्कार और परंपराओं को प्राथमिकता देते हुए एक नई वैदिक विवाह पद्धति शुरू की है, जिसमें न तो भव्य सजावट होगी और न ही शोर-शराबा। इस पहल का उद्देश्य समाज में सादगी और संस्कार का संदेश फैलाना है।
विवाह की नई परंपरा और सामाजिक संदेश
यह वैदिक विधि से संपन्न विवाह समारोह में केवल मंत्रोच्चार, अग्नि और सात फेरों का ही आयोजन किया जाएगा। इसमें अधिकतम 15 से 20 मेहमानों को ही भाग लेने की अनुमति होगी। विवाह के दौरान दो वरमाला और मिठाई का आदान-प्रदान ही प्रतीकात्मक रूप से किया जाएगा। न तो डीजे, न ही बैंड-बाजा या भव्य सजावट की अनुमति होगी। साथ ही, बारात और भोजन की व्यवस्था भी इस समारोह का हिस्सा नहीं होगी।
सामाजिक बदलाव और संस्कारों का प्रचार
गायत्री परिवार के प्रांतीय शक्तिपीठ के समन्वयक राकेश कुमार गुप्ता ने बताया कि यह पहल उनके संगठन की सात प्रमुख क्रांतियों का हिस्सा है, जिनमें साधना, स्वास्थ्य, शिक्षा, नारी जागरण और नशा निवारण शामिल हैं। उनका मानना है कि फिजूलखर्ची को रोकने और संस्कारों को मजबूत करने के लिए यह कदम जरूरी है। वे कहते हैं कि शादी में दान और दहेज का विरोध करते हुए, समाज को सरल और सादगीपूर्ण विवाह की ओर प्रेरित किया जा रहा है।
गृहस्थ जीवन को एक तपोवन बताते हुए, इस समारोह में संयम, सेवा और सहिष्णुता को मुख्य मानक माना गया है। राकेश कुमार गुप्ता ने कहा कि इस वैदिक विधि से विवाह का उद्देश्य न केवल परंपराओं का पालन है, बल्कि परिवार की स्थिरता और संस्कारों का संरक्षण भी है।
इस नई परंपरा का उदाहरण देते हुए, वैभव वर्मा और प्रिया शर्मा ने बताया कि उन्होंने अपने विवाह में केवल 1000 रुपए खर्च किए, जिसमें न तो दहेज था और न ही दिखावा। वहीं, जय अरोड़ा और मधु पांडेय ने भी कम खर्च में शादी कर समाज को एक नई दिशा दी है।
आसान रजिस्ट्रेशन और समाज में संदेश
गायत्री शक्तिपीठ में विवाह का रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया भी सरल और पारदर्शी है। इसमें परिवारों को आवश्यक सामग्री लानी होती है, और रजिस्ट्रेशन कम से कम 15 दिन या एक महीने पहले कराना अनिवार्य है। दोनों पक्षों के माता-पिता की लिखित सहमति जरूरी है। इस प्रक्रिया में कोई शुल्क नहीं लिया जाता, केवल पूजा सामग्री के लिए मामूली राशि ही ली जाती है।
शक्तिपीठ के परिसर में दीवारों और पोस्टरों पर समाज को सही दिशा देने वाले संदेश लिखे गए हैं। इनमें कहा गया है कि खर्चीली शादियों को बंद कर सादगी और वैदिक परंपराओं को अपनाना चाहिए। संदेश में यह भी कहा गया है कि खर्चीली शादियां समाज को दरिद्र और बेईमान बनाती हैं। इस तरह का प्रयास समाज में नई सोच और संस्कारों के पुनरुद्धार का संकेत है।











