भारत और रूस के बीच एसयू 57 डील की प्रगति
आसमान में जब वैश्विक शक्ति का संघर्ष तेज हो रहा हो और चीन तथा पाकिस्तान अपनी सैन्य ताकत का दिखावा कर रहे हों, उस समय भारत ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यदि यह समझौता सफलतापूर्वक पूरा हो जाता है, तो भारतीय वायु सेना की क्षमता में असाधारण वृद्धि होगी। रूस का सुपर हंटर जेट, जिसे एसयू 57 के नाम से जाना जाता है, अब भारत के स्क्वाड्रन में शामिल होने के करीब है। खबरें हैं कि भारत और रूस के बीच 84 एसयू 57 फाइटर जेट्स की डील लगभग अंतिम चरण में है, जिससे यह संकेत मिलता है कि जल्द ही ये विमान भारतीय वायुसेना की ताकत का अभिन्न हिस्सा बन जाएंगे।
एसयू 57 की विशेषताएँ और भारत के साथ संभावित समझौता
यह समझौता केवल एक सैन्य खरीदारी नहीं है, बल्कि भारत की रणनीतिक योजना का एक बड़ा हिस्सा है। 2018 में भारत ने फिफ्थ जेनरेशन एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट से पीछे हटने का फैसला किया था, क्योंकि उस समय इसमें इंजन, स्टील्थ तकनीक और मेंटेनेंस से जुड़ी कुछ सीमाएँ थीं। लेकिन पिछले सात वर्षों में रूस ने अपने इस हंटर को अत्याधुनिक तकनीकों से लैस किया है, जिससे यह दुनिया के सबसे खतरनाक फाइटर जेट्स में शुमार हो गया है। नाटो (NATO) इसे पैलन नाम से पुकारता है, और अब यह दुश्मनों के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। सूत्रों के अनुसार, रूस ने भारत को 84 एसयू 57 स्टील्थ फाइटर जेट्स की पेशकश की है, जिनमें से पहली दो स्क्वाड्रन सीधे रूस से भारत को मिलेंगे, जबकि शेष तीन से पांच स्क्वाड्रन का निर्माण भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) द्वारा किया जाएगा।
अमेरिकी और रूसी फाइटर जेट्स की तुलना
जहां तक अमेरिकी फाइटर जेट्स की बात है, एफ-35 (F-35) जैसे विमान अभी भी तकनीकी और परिचालन संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। लॉकहीड मार्टिन का लाइटनिंग II विमान लागत, तकनीकी खामियों और सीमाओं के कारण विवादों में रहा है। शुरुआती मॉडल में ऑक्सीजन प्रणाली और बंदूक की सटीकता जैसी समस्याएँ थीं, जिनके समाधान में वर्षों लगे। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि एसयू 57 क्षमता में एफ-35 के बराबर हो, लेकिन यह अधिक लचीलापन और स्थानीय निर्माण की सुविधा प्रदान करता है। भारत के लिए यह विकल्प केवल एक दोषपूर्ण रूसी विमान या अमेरिकी विमान के बीच का चुनाव नहीं है, बल्कि इसमें संशोधन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर प्रतिबंध भी शामिल हैं, जिनका भारत अक्सर विरोध करता है। इस स्थिति में, एसयू 57 अपनी सीमाओं के बावजूद, अनुकूलन और स्थानीय निर्माण के लिहाज से अधिक विकल्प प्रदान करता है। इसलिए, भारत अपने रक्षा कार्यक्रम में धीमी प्रगति के बावजूद इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।











