बिहार में चुनावी वादों का असर और आर्थिक स्थिति
जैसे-जैसे बिहार में आगामी चुनावों का समय नजदीक आ रहा है, राजनीतिक दल अपने-अपने विकास और रोजगार के वादे कर रहे हैं। इन वादों में हर घर सरकारी नौकरी और एक करोड़ रोजगार का दावा प्रमुख है। हालांकि, बिहार की मौजूदा आर्थिक स्थिति इन घोषणाओं को पूरा करने के लिए कितनी सक्षम है, यह सवाल बनकर रह गया है। बिहार पर पहले से ही भारी कर्ज का बोझ है, और 2024-25 में इसका बकाया कर्ज उसकी कुल जीएसडीपी (GSDP) का लगभग 37.1 प्रतिशत हो चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये चुनावी वादे केवल वोटों के लिए हैं या फिर इन पर अमल संभव है।
बिहार का कर्ज और अन्य राज्यों की तुलना
बिहार का कर्ज अनुपात अन्य राज्यों की तुलना में अभी भी कम है, लेकिन यह चिंता का विषय बना हुआ है। कर्नाटक में यह 27.5 प्रतिशत, पंजाब में 24.8 प्रतिशत, महाराष्ट्र में 24.7 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 23.7 प्रतिशत, राजस्थान में 22.1 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 21.5 प्रतिशत है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बिहार का कर्ज अनुपात अभी भी इन राज्यों से अधिक है, जो वित्तीय स्थिरता के लिहाज से चिंताजनक संकेत है।
विकास खर्च और वित्तीय चुनौतियां
बिहार में वेतन खर्च का प्रतिशत अन्य राज्यों की तुलना में कम होने के बावजूद, राज्य की विकास के लिए खर्च करने की क्षमता सीमित है। राज्य का राजस्व खर्च लगातार बढ़ रहा है, जबकि पूंजीगत खर्च यानी इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास कार्यों के लिए आवंटित धन घटता जा रहा है। 2017-18 में कुल बजट का 75.2 प्रतिशत हिस्सा राजस्व खर्च में जाता था, जो अब बढ़कर 85.7 प्रतिशत हो गया है। वहीं, पूंजीगत खर्च की हिस्सेदारी 24.8 प्रतिशत से घटकर 14.3 प्रतिशत रह गई है।
बिहार का बढ़ता कर्ज और भविष्य की चुनौतियां
बिहार का आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा है। राज्य की कुल जीएसडीपी के मुकाबले बकाया कर्ज 2024-25 में 37.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यदि चुनावी वादों के तहत खर्च और बढ़ता है, तो इससे राज्य की विकास योजनाओं और वित्तीय स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इस स्थिति में, बिहार को अपने वित्तीय संसाधनों का सही उपयोग और दीर्घकालिक विकास रणनीतियों पर ध्यान देना आवश्यक हो गया है।









