सुप्रीम कोर्ट का निचली अदालत के जज के रवैये पर कड़ा रुख
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक निचली अदालत के जज के व्यवहार पर अपनी असंतोष व्यक्त की है। इस जज ने बिना मांगे ही सुप्रीम कोर्ट को जमानत कानून से संबंधित सलाह दे दी थी। इस मामले में कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देशित किया है कि वह संबंधित जज से तुरंत स्पष्टीकरण मांगे।
यह मामला पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले का है, जहां बारासात के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एक आपराधिक मामले की सुनवाई कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस की सुनवाई को मई 2026 तक पूरा करने का आदेश दिया था, लेकिन तीन महीने बीतने के बाद भी ट्रायल पूरा नहीं हो पाया। इसके बाद जज ने 11 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट के असिस्टेंट रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर अतिरिक्त समय की मांग की।
जज की टिप्पणी और सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी
पत्र में जज ने बताया कि मामले की सुनवाई पूरी करने के लिए उन्हें और समय चाहिए, लेकिन पत्र के अंतिम दो पैराग्राफ में उन्होंने जमानत से संबंधित सुझाव भी दे दिए। उन्होंने लिखा कि यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन मामलों में उच्च अदालत को जमानत देनी चाहिए और किन मामलों में नहीं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ इस पत्र पर काफी नाराज हुई। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल जज का सुप्रीम कोर्ट को इस तरह की सलाह देना अनुचित है और यह उनके कार्यक्षेत्र में नहीं आता। कोर्ट ने यह भी कहा कि जज की भाषा और सलाह गंभीर चिंता का विषय हैं। रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वह जज से जल्द से जल्द स्पष्टीकरण मांगे और जानें कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों लिखा।
संबंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
इसी तरह के एक अन्य मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के जजों को महत्वपूर्ण सलाह दी है। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कहा कि जजों को अपने व्यक्तिगत विचार या नैतिक मान्यताओं को फैसले पर थोपना नहीं चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत से संबंधित निर्णय कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। इस टिप्पणी का मकसद यह है कि न्यायिक फैसले व्यक्तिगत सोच से नहीं, बल्कि कानूनी प्रावधानों और साक्ष्यों के आधार पर लिए जाने चाहिए।










