सत्य निकेतन PG हादसे ने सुरक्षा व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल
सत्य निकेतन (Satyav Niketana) में हुए इस हादसे ने दिल्ली के छात्रावास और PG (प्री-ग्रेजुएट) होस्टल की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इलाके की कई इमारतें जर्जर अवस्था में हैं, और इनकी सुरक्षा मानकों का कोई सही पालन नहीं हो रहा है। आजतक (Aaj Tak) के एक स्टिंग ऑपरेशन में खुलासा हुआ कि अधिकांश PG में सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं हैं और सुरक्षा ऑडिट भी नहीं कराए जाते। साथ ही, बिजली कनेक्शन से होने वाली कमाई का भी दावा किया जा रहा है।
PG कारोबार में बिजली कनेक्शन का बड़ा हिस्सा है कमाई का जरिया
सत्य निकेतन की अधिकांश इमारतों में कई मंजिलें हैं, जिनमें से हर मंजिल का मालिक अलग है। एक छात्र को PG दिलाने पर इन मकानों से करीब 4500 से 5000 रुपये का मार्जिन प्राप्त होता है। ब्रोकर का कहना है कि बिजली के कनेक्शन से भी इन PG का बड़ा आर्थिक लाभ होता है। छात्रों से बिजली के बिल के नाम पर प्रति यूनिट लगभग 17 से 18 रुपये वसूले जाते हैं।
ब्रोकर का यह भी दावा है कि कई छात्रों को दिल्ली के बिजली बिल की जानकारी नहीं होती, और उन्हें यह नहीं पता चलता कि PG में बिजली का अलग से हिसाब लिया जा रहा है। साथ ही, यह भी कहा गया कि यहां छात्रों को दिल्ली सरकार की 200 यूनिट मुफ्त बिजली की सुविधा नहीं मिलती।
ब्रोकर ने यह भी बताया कि एक PG मालिक हर महीने करीब दो लाख रुपये से तीन लाख रुपये तक कमा सकता है। इन मालिकों को बिल्डिंग का संचालन ब्रोकर को सौंपना पड़ता है, और हर महीने उन्हें लगभग दो लाख रुपये देना होता है, चाहे कमरे खाली हों या भरे। उसकी खुद की मासिक आय करीब 40 हजार रुपये बताई जाती है।
PG सुरक्षा और प्रशासनिक जिम्मेदारी पर सवाल
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) के साउथ कैंपस (South Campus) के पास स्थित एक बड़े छात्र क्षेत्र में है, जहां बड़ी संख्या में छात्र PG और हॉस्टल में रहते हैं। इस इलाके में लगभग 200 PG होने का दावा किया जाता है। आसपास कई प्रमुख कॉलेज हैं, जैसे वेंकटेश्वर कॉलेज, आर्यभट्ट कॉलेज, मोतीलाल नेहरू कॉलेज और मैत्रेयी कॉलेज। दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस में पर्याप्त हॉस्टल न होने के कारण, बाहर से आने वाले छात्रों को निजी PG का सहारा लेना पड़ता है।
इस हादसे ने इन PG की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्रों का आरोप है कि कई जगह सुरक्षा नियमों का उल्लंघन हो रहा है। जर्जर इमारतों में छोटे और भीड़भाड़ वाले कमरों में छात्र रहने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि इन इमारतों को आखिर सुरक्षा मंजूरी कैसे मिलती है, जब सुरक्षा ऑडिट ही नहीं हो रहा है। जिम्मेदारी किसकी है, यह भी स्पष्ट नहीं है। हादसे के बाद कार्रवाई तो की जाती है, लेकिन कुछ समय बाद मामला फिर ठंडा पड़ जाता है।
सत्य निकेतन का यह मामला केवल एक हादसे का विषय नहीं है, बल्कि यह दिल्ली में छात्रों की सुरक्षा और PG व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। देश के दूसरे शहरों से बेहतर भविष्य की आशा लेकर दिल्ली आने वाले छात्र आखिर सुरक्षित तरीके से कहां रह सकते हैं, यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है।









