बांकीपुर उपचुनाव: बिहार की राजनीति में नई चुनौती
बिहार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में सत्ता संभालने के बाद पहली बार बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव का आयोजन हो रहा है। यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य चुने जाने के कारण खाली हुई है, और इस सीट के लिए 30 जुलाई को मतदान होगा। अभी तक बीजेपी ने इस उपचुनाव में अपने उम्मीदवार का खुलासा नहीं किया है, लेकिन जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने इस चुनाव में भाग लेने का ऐलान कर दिया है। क्या पीके का मैदान में उतरना बांकीपुर का सियासी समीकरण बदल देगा? यह सवाल हर किसी के मन में है।
प्रशांत किशोर का चुनावी मैदान में उतरना और सियासी समीकरण
प्रशांत किशोर ने आधिकारिक तौर पर बांकीपुर सीट से उपचुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। वहीं, कांग्रेस ने संकेत दिए थे कि वह इस चुनाव में अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी। इसके बावजूद, आरजेडी, बीजेपी और पीके के खिलाफ पूरी ताकत से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। इस सीट पर बीजेपी का मजबूत वर्चस्व माना जाता है, जहां पिछले तीन दशकों से पार्टी का कब्जा रहा है। नितिन नवीन के पहले उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा यहां से लगातार जीतते आए हैं। 2006 में नवीन किशोर के निधन के बाद से ही नितिन नवीन इस सीट पर विधायक हैं, और उन्होंने पांच बार जीत हासिल की है।
बांकीपुर का सियासी महत्व और वोटर समीकरण
बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का सियासी समीकरण काफी जटिल और महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां पर करीब 3 लाख 91 हजार मतदाता हैं, जिनमें सबसे अधिक संख्या कायस्थ समुदाय की है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से बीजेपी का मुख्य वोटबैंक रहा है, जिसमें लगभग 14 प्रतिशत वोटर हैं। इसके अलावा यादव, मुस्लिम, वैश्य, दलित, भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कुर्मी जैसे समुदाय भी इस सीट पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। खास बात यह है कि कायस्थ वोटर बीजेपी का मजबूत आधार हैं, जबकि मुस्लिम और यादव वोटर आरजेडी का मुख्य समर्थन आधार हैं। पीके के मैदान में आने से इस समीकरण में नई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं, खासकर जब आरजेडी किसी चंद्रवंशी प्रत्याशी को मैदान में उतारने की योजना बना रही है।











