महाराष्ट्र के कराड में रंगोली कला का अद्भुत प्रदर्शन
महाराष्ट्र के कराड शहर में एक बुजुर्ग कलाकार अपनी अनूठी कला के माध्यम से लोगों का दिल जीत रहे हैं। शरद काका के नाम से प्रसिद्ध इस 80 वर्षीय कलाकार का जीवन जीवटता और मुस्कान का प्रतीक है। हर सुबह छह बजे से उनकी दिनचर्या शुरू होती है, जब वे जैन मंदिर के द्वार पर पहुंचकर रंगोली बनाने का सिलसिला शुरू करते हैं।
रंगोली के माध्यम से जीवन में रंग भरना
शरद काका अपने हाथों में रंगोली का डिब्बा लेकर गली-गली घूमते हैं। उनके बनाए गए चित्र घरों, दुकानों और गलियों की शोभा बढ़ाते हैं। कभी मोर, कभी पोपट, तो कभी फूलों की सजावट वाली रंगोली, ये सभी शहरवासियों के चेहरे पर मुस्कान ला देती हैं। जब लोग उन्हें रंगोली बनाते देखते हैं, तो वे प्रशंसा में कह उठते हैं, “वाह! कितनी सुंदर!” इस प्रशंसा से शरद काका को भी संतुष्टि मिलती है, जो उनकी असली कमाई है।
कला के प्रति उनका समर्पण और जीवन का संदेश
बचपन से ही चित्रकला में रुचि रखने वाले शरद काका ने शुरुआत में पाटी-पेंसिल से चित्र बनाए, लेकिन उम्र के साथ हाथों में थरथराहट शुरू हो गई। इस चुनौती के बावजूद, उन्होंने अपने कला के प्रति लगाव नहीं छोड़ा। उन्होंने तय किया कि कला को घर-घर तक पहुंचाएंगे और रंगोली के माध्यम से जीवन में रंग भरेंगे। उनकी मेहनत और लगन की बदौलत आज कराड के लगभग 25 घरों और दुकानों के सामने उनकी रंगोली सजती है। वे कभी भी पैसे नहीं लेते, बल्कि प्यार और सम्मान के साथ फल, चाय या छोटी-मोटी राशि प्राप्त करते हैं। उनका उद्देश्य कला को जीवित रखना और शहर में खुशियों का संचार करना है।
उनकी पत्नी उनके साथ हैं, और उनका परिवार भी उनके इस जुनून का हिस्सा है। उनकी दो बेटियां शादीशुदा हैं और अपने-अपने घरों में रहती हैं। परिवार का खर्च उनकी पत्नी रोज गली-गली मटकी बेचकर चलाती हैं। त्योहारों जैसे गणेशोत्सव, दिवाली और नवरात्रि पर शरद काका की रंगोली कराड की सुंदरता को और भी निखार देती है। कमल का फूल, मोर, घोड़ा या पोपट, हर रंगोली जीवंत और आकर्षक लगती है।
स्थानीय लोगों की प्रशंसा और प्रेरणा
कराड के निवासी शरद काका की कला को देखकर बहुत खुश होते हैं। जीनल ओसवाल कहती हैं कि हमारा क्षेत्र हर दिन रंगों से जगमगाता है। नितीन ओसवाल बताते हैं कि जब भी मैं बाहर निकलता हूं, हर दुकान और घर में शरद काका की रंगोली दिखाई देती है, जो उनकी कला का प्रमाण है। प्रदीप दलवी कहते हैं कि शरद काका हर त्योहार पर नई और आकर्षक रंगोली बनाते हैं, जो उनकी मेहनत और कला का परिचायक है।
80 साल की उम्र में भी उनका उत्साह युवाओं को प्रेरित करता है। शरद काका की रंगोली न केवल कला है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि उम्र कोई भी हो, प्यार और लगन से की गई कला सदैव जीवित रहती है। कराड के लोग मानते हैं कि उनकी वजह से उनके घरों और गलियों में हर दिन रंग बिखरा रहता है। उनकी कला जीवन में उत्साह और मेहनत का प्रतीक है, जिसने साबित कर दिया है कि कला उम्र की मोहताज नहीं होती। यह निरंतर प्रयास, लगन और दिल से की गई मेहनत का परिणाम है, जिसे कराड शहर में 80 साल की उम्र में शरद काका ने साबित कर दिखाया।











