योजिता ठाकरे की दुखद कहानी: एक पिता का दर्द और सिस्टम की खामियां
छिंदवाड़ा (Chhindwara) के एक निजी स्कूल में शिक्षक सुशांत ठाकरे की दो वर्षीय बेटी योजिता की जिंदगी एक दर्दनाक मोड़ पर आकर खत्म हो गई। उस दिन की घटना ने न केवल एक पिता का दिल तोड़ दिया, बल्कि स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की गंभीर खामियों को भी उजागर कर दिया है। योजिता की अचानक बिगड़ती तबीयत और उसकी मौत ने पूरे परिवार को हिला कर रख दिया है।
बच्ची की असामयिक मौत का कारण और संघर्ष
8 सितंबर की शाम को योजिता को तेज बुखार हुआ, जिसे लेकर पिता सुशांत ने पहले ही डॉक्टर ठाकुर के पास जाने का प्रयास किया। जब वह उपलब्ध नहीं थे, तो उन्होंने पास के ही डॉक्टर प्रवीण सोनी से संपर्क किया। डॉक्टर ने कुछ दवाइयां दीं और चार बार दवा लेने की सलाह दी, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ। इसके बाद, बेटी की हालत बिगड़ने लगी और लगातार उल्टियां होने लगीं। पिता तुरंत फिर से डॉक्टर सोनी के पास पहुंचे, जिन्होंने कहा कि बच्ची को तुरंत नागपुर ले जाना चाहिए क्योंकि उसकी किडनी में संक्रमण है।
इलाज की जंग और अस्पताल का बिल
नागपुर पहुंचने के बाद, योजिता को नेल्सन हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहां 22 दिनों तक उसकी जिंदगी के लिए संघर्ष चलता रहा। इस दौरान उसे 16 बार डायलिसिस पर रखा गया, और हर दिन की लागत करीब 13 लाख रुपये तक पहुंच गई। पिता ने अपनी सारी जमा पूंजी, एफडी तोड़ी, दोस्तों और रिश्तेदारों से मदद ली, और सोशल मीडिया पर क्राउडफंडिंग भी की। बावजूद इसके, 4 अक्टूबर को डॉक्टर ने कहा कि अब उसकी किडनी जवाब दे चुकी है, और योजिता का निधन हो गया।
सिस्टम की खामियां और न्याय की उम्मीद
योजिता की मौत ने एक बार फिर स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की गंभीर खामियों को उजागर किया है। पिता का कहना है कि यदि सही समय पर सही इलाज और उचित अस्पताल की जानकारी मिलती, तो शायद उनकी बेटी आज जिंदा होती। सरकार ने योजिता के परिवार को चार लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की है, लेकिन पिता का मानना है कि उनकी बेटी की जान की कीमत पैसे से नहीं आंकी जा सकती।
सवाल जो अभी भी अनुत्तरित हैं
क्या शुरुआती इलाज में कोई लापरवाही हुई? क्या डॉक्टरों ने समय रहते सही सलाह दी? और सबसे बड़ा सवाल-क्या छोटे शहरों में बच्चों के गंभीर इलाज की उचित सुविधा उपलब्ध है? इन सवालों के जवाब अभी भी अस्पष्ट हैं, लेकिन योजिता की कहानी ने सिस्टम की उन खामियों को फिर से उजागर कर दिया है, जहां इलाज पैसे और समय से जुड़ा होता है।
आखिरी आवाज और बदलाव की उम्मीद
सुशांत ठाकरे अब हर उस माता-पिता के लिए आवाज बनना चाहते हैं, जिनके बच्चे ऐसी लापरवाहियों का शिकार हो सकते हैं। उनका कहना है कि यदि समय पर सही कदम उठाए जाते, तो शायद उनकी बेटी आज हमारे बीच होती। वे चाहते हैं कि दोषियों को सजा मिले और हर बच्चे को समय पर उचित इलाज मिले। योजिता की मौत ने एक बार फिर सिस्टम में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया है।











