बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान का कार्यकाल और उनकी भूमिका
बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के पटना से विदाई के बाद राजधानी के राजनीतिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में उनके कार्यकाल को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कम समय में ही उन्होंने अपनी सक्रियता, सार्वजनिक कार्यक्रमों में भागीदारी और विश्वविद्यालयों से जुड़े मुद्दों पर बेबाक टिप्पणियों के कारण अलग पहचान बनाई।
जनवरी 2025 में बिहार के राज्यपाल पद संभालने वाले खान का कार्यकाल मार्च 2026 में समाप्त हुआ, जब केंद्र सरकार ने सेवानिवृत्त सेना अधिकारी सैय्यद अता हसनैन को राज्य का नया राज्यपाल नियुक्त किया। अपने लगभग 428 दिनों के कार्यकाल में उन्होंने राजभवन को एक सक्रिय और जनता के बीच अधिक दिखाई देने वाला संस्थान बनाने का प्रयास किया।
सामाजिक और शैक्षणिक गतिविधियों में उनकी सक्रियता
आरिफ मोहम्मद खान का कार्यकाल पारंपरिक रूप से शांत और औपचारिक माना जाता था, लेकिन उन्होंने अपने कार्यकाल में शैक्षणिक संस्थानों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक आयोजनों में लगातार भाग लिया। पटना और अन्य शहरों में आयोजित सेमिनार, दीक्षांत समारोह, पुस्तक विमोचन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति अक्सर चर्चा का विषय बनती थी। वे छात्रों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों से खुलकर संवाद करते थे।
उनके भाषणों की खास बात यह थी कि वे अक्सर भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक परंपरा, संविधान और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर विस्तार से बात करते थे। कई अकादमिक मंचों पर उनकी उपस्थिति को एक बौद्धिक विमर्श के रूप में देखा गया, जिससे उनकी छवि एक जागरूक और विचारशील नेता की बन गई।
विश्वविद्यालयों में सक्रियता और विवादित मुद्दे
बिहार के राज्यपाल के रूप में आरिफ मोहम्मद खान ने विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में भी अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप किया। कई विश्वविद्यालयों का दौरा कर शिक्षकों और छात्रों से मुलाकात की और विश्वविद्यालय प्रशासन को अनुशासन, शैक्षणिक कैलेंडर और कैंपस माहौल सुधारने के निर्देश दिए।
पटना विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, जहां उन्होंने छात्रों से सीधे संवाद किया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी समस्याओं का समाधान नहीं करता, तो वे सीधे राजभवन से संपर्क कर सकते हैं। इस सक्रियता को लेकर कुछ ने इसे सकारात्मक कदम माना, तो कुछ ने इसे विश्वविद्यालय स्वायत्तता में हस्तक्षेप बताया।
उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय परिसरों में बढ़ती अराजकता और हिंसक घटनाओं को लेकर भी उन्होंने चिंता व्यक्त की। पटना विश्वविद्यालय से जुड़ी हिंसक घटनाओं के बाद उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में अपराधियों का प्रभाव बढ़ना चिंता का विषय है। इस टिप्पणी ने शिक्षा व्यवस्था पर बहस को जन्म दिया, जिसमें कुछ ने इसे सिस्टम की समस्याओं का संकेत माना, तो कुछ ने विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया।
राजनीतिक स्तर पर भी उन्होंने विभिन्न दलों के नेताओं से संवाद बनाए रखा। राजभवन में आयोजित कार्यक्रमों में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेता शामिल होते रहे। शुरुआत में उनकी मुलाकात लालू प्रसाद यादव जैसी प्रमुख राजनीतिक हस्तियों से भी हुई, जिसे लेकर चर्चा हुई।
दिसंबर 2025 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का नकाब हटाने की घटना पर भी राजनीतिक विवाद हुआ। इस मामले में खान ने मुख्यमंत्री का समर्थन किया और कहा कि नीतीश कुमार छात्राओं को अपनी बेटियों की तरह मानते हैं। उनके इस बयान के बाद विपक्ष ने उनकी भूमिका पर सवाल उठाए और इसे राजनीतिक हस्तक्षेप बताया।
सारांश में, लगभग 14 महीनों के अपने कार्यकाल में आरिफ मोहम्मद खान ने पारंपरिक सीमाओं से ऊपर उठकर एक अधिक सक्रिय और प्रभावशाली राज्यपाल की छवि बनाई। उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने राजभवन को एक सार्वजनिक विमर्श का मंच बनाया, जबकि आलोचक कहते हैं कि कभी-कभी उनकी शैली सीमा से बाहर चली जाती थी। उनके जाने के बाद भी पटना में उनकी सक्रियता और बेबाकी की चर्चा जारी है, जिसने उन्हें एक अलग पहचान दी।










