बिहार राजनीति में बीजेपी की लंबी यात्रा और रणनीति
बीजेपी को बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाने में दो दशक से अधिक का समय लगा है। शुरुआत में नीतीश कुमार के साथ जुड़कर उसकी राह आसान नहीं थी, बल्कि उन्हें पीछे छोड़ते हुए कई बार संघर्ष करना पड़ा। नीतीश कुमार के दो बार साथ छोड़ने के बावजूद, बीजेपी ने उन्हें फिर से अपने साथ जोड़ा। इस बार, नीतीश कुमार को अपनी गलतियों का एहसास कराते हुए, पार्टी ने उन्हें मनाने में खास मेहनत की। अब वह कहने लगे हैं कि वे राजनीति से दूर नहीं जाएंगे।
नीतीश कुमार का स्थानांतरण और बिहार में राजनीतिक समीकरण
बिहार से नीतीश कुमार को हटाकर उन्हें राज्यसभा के जरिए दिल्ली में स्थानांतरित करने के लिए बीजेपी को काफी प्रयास करने पड़े। इसमें साम-दाम-दंड-भेद जैसी राजनीति का सहारा लेना पड़ा। नीतीश कुमार को अपने कमजोर पड़ने का इंतजार भी करना पड़ा, और अभी तक ऐसी स्थिति नहीं बन पाई है कि बीजेपी उनके बिना बिहार में कोई बड़ा कदम उठा सके। 2025 के बिहार चुनाव से पहले ही प्रशांत किशोर जैसे विशेषज्ञों ने जेडीयू और नीतीश कुमार को लेकर कई दावे किए थे, जो अब धीरे-धीरे सच होते नजर आ रहे हैं। नीतीश कुमार के बिहार छोड़ने की घोषणा के बाद पार्टी के भविष्य पर भी सवाल उठने लगे हैं।
बिहार चुनाव और राजनीतिक बदलाव की दिशा
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने मोदी-शाह युग की शुरुआत की, जिसमें पिछड़ी जातियों को साथ लाने का प्रयास किया गया। बिहार में भी, इस नए दौर में, बीजेपी ने सहयोगी दलों पर दबाव बनाना शुरू किया। चिराग पासवान की भूमिका 2020 और 2025 दोनों चुनावों में बीजेपी के लिए अहम साबित हुई। 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर लगभग 19.5 प्रतिशत रहा, जबकि जेडीयू का लगभग 15.4 प्रतिशत। इन नतीजों ने संकेत दिया कि बिहार की राजनीति में बदलाव की बयार चल रही है।
नीतीश कुमार की राजनीतिक ताकत और विजन के बल पर बीजेपी ने बिहार में अपनी पकड़ मजबूत की, लेकिन सत्ता पाने के लिए उन्हें पांच साल का इंतजार करना पड़ा। 2005 में गठबंधन सरकार बनी, जिसमें जेडीयू ने 88 सीटें जीतीं, और बीजेपी को 55। 2010 में दोनों का प्रदर्शन बेहतर हुआ। 2014 के आम चुनाव में, नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होकर सीपीआई के साथ चुनाव लड़ा, लेकिन 2015 में फिर से महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। उस समय भी बीजेपी ने अपने वोट शेयर में बढ़ोतरी की, और 2020 में फिर से बिहार की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत की।
2022 में नीतीश कुमार ने फिर से पाला बदलकर विपक्ष का समर्थन किया और बिहार में इंडिया (INDIA) ब्लॉक की स्थापना की। इसके बाद, 2025 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अपनी रणनीति के तहत नीतीश कुमार को फिर से अपने साथ लाने का प्रयास किया। चुनाव परिणामों में बीजेपी को 89 सीटें मिलीं, जबकि जेडीयू को 85। इस तरह, बीजेपी ने नीतीश कुमार को बिहार छोड़ने पर मजबूर कर दिया, लेकिन अब उसकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या नीतीश कुमार की ‘पलटूराम’ (बदलाव) वाली राजनीति खत्म हो जाएगी।
सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए बीजेपी ने कई नेताओं को फिर से साथ लिया, लेकिन अभी भी कोई ऐसा नेता नहीं है जो सभी जातियों का समर्थन हासिल कर सके। इसलिए, संगठन में निशांत कुमार जैसे नेताओं को शामिल किया गया है, और उनके डिप्टी सीएम बनने की चर्चा भी चल रही है।
जेडीयू का भविष्य और बीजेपी का विकल्प
बीजेपी ने नीतीश कुमार को बिहार छोड़ने के लिए राजी कर लिया है, लेकिन अब उसकी सबसे बड़ी चुनौती है कि क्या जेडीयू का बीजेपी में विलय हो जाएगा। यदि ऐसा होता है, तो बीजेपी को अपने वोट शेयर के साथ-साथ जेडीयू का समर्थन भी मिल जाएगा, जिसमें सवर्ण, लव-कुश समीकरण और ईबीसी वोटर शामिल हैं। इससे विपक्ष मुक्त बिहार का सपना भी साकार हो सकता है।
हालांकि, हर स्थिति का दूसरा पहलू भी है। बीजेपी को नापसंद करने वाले भी जेडीयू के कारण एनडीए का समर्थन करते हैं। यदि जेडीयू का बीजेपी में विलय होता है, तो संभव है कि कुछ वोटर नाराज होकर विपक्ष की तरफ पलट जाएं। इस आशंका के चलते, बीजेपी अभी जल्दबाजी में नहीं है। नीतीश कुमार की विरासत को संभालने और उनके साथ बने रहने के लिए, ‘धीरे धीरे रे मना…’ जैसी कहावत ही सबसे उपयुक्त विकल्प है।











