नीतीश कुमार का राज्यसभा में नामांकन और राजनीतिक बदलाव
नीतीश कुमार ने हाल ही में राज्यसभा के लिए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया है, जिससे बिहार की राजनीति में नई हलचल मच गई है। उनके साथ जद(यू) के रामनाथ ठाकुर, भाजपा के नितिन नवीन और शिवेश कुमार, साथ ही राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा ने भी अपना नामांकन भरा है। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पटना पहुंचे हैं, जो इस अवसर पर गवाह बन रहे हैं। नामांकन के बाद वे एनडीए नेताओं के साथ बैठक कर नई सरकार के गठन पर चर्चा कर सकते हैं। यह घटनाक्रम न केवल एक नेता के संसद पहुंचने का संकेत है, बल्कि बिहार की 20 वर्षों पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के अंत और नए सत्ता समीकरण की शुरुआत का भी प्रतीक है।
नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य और बेटे की भूमिका
75 वर्ष की उम्र में नीतीश कुमार का यह कदम उनके राजनीतिक करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, वे अपने स्वास्थ्य और उम्र को ध्यान में रखते हुए सक्रिय राजनीति से दूर हो रहे हैं, ताकि भाजपा को मुख्यमंत्री पद सौंपने का रास्ता साफ हो सके। इस बीच, उनके बेटे निशांत कुमार को उप-मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा भी तेज हो रही है, जो उनके राजनीतिक जीवन की नई शुरुआत का संकेत है। हालांकि, नीतीश कुमार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वे परिवारवाद के खिलाफ हैं, इसलिए यह कहना कि वे अपने बेटे को राजनीति में स्थापित कर रहे हैं, केवल कयास ही हैं। उनके इस कदम का मकसद कहीं न कहीं पार्टी के भविष्य को सुरक्षित करने का प्रयास भी हो सकता है।
बिहार की राजनीति में बदलाव और वोट बैंक का भविष्य
नीतीश कुमार का वोट बैंक मुख्य रूप से कुर्मी-कोइरी (लव-कुश), अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी), महादलित और महिलाओं पर आधारित है। राज्यसभा जाने के बाद उनका व्यक्तिगत प्रभाव कम हो सकता है, लेकिन यदि निशांत कुमार उप-मुख्यमंत्री बनते हैं, तो यह वोट बैंक जद(यू) के पास ही रह सकता है। नीतीश ने ईबीसी वर्ग को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे रामनाथ ठाकुर को राज्यसभा में भेजना। अब भाजपा इस वोट बैंक को अपनी ओर खींचने का प्रयास करेगी, खासकर सवर्ण जातियों और दलितों को जोड़कर। 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए की जीत का आधार नीतीश की लोकप्रियता थी, लेकिन अब भाजपा की नजर उनके वोट बैंक पर भी है। आरजेडी और कांग्रेस भी इस वोट बैंक को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं, पर भाजपा की रणनीति स्पष्ट है कि वह जद(यू) के वोट बैंक को अपने साथ मिलाने में सफल हो जाएगी।










