मध्य प्रदेश में टोल वसूली का विवाद और उसकी सच्चाई
मध्य प्रदेश में टोल वसूली को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि राज्य सड़क विकास निगम (MPRDC) ने कई सड़कों पर आधिकारिक अधिसूचना जारी होने से पहले ही टोल वसूली शुरू कर दी थी। यह वसूली उस समय से शुरू हो गई थी जब कानूनन इसे लागू होना था, यानी कई महीनों या वर्षों पहले। इस खुलासे का स्रोत विधानसभा में PWD (Public Works Department) की ओर से जारी जवाब है।
विधानसभा में सवाल और खुलासे का मामला
विधानसभा में कांग्रेस विधायक प्रताप ग्रेवाल ने पूछा था कि किन सड़कों पर कब-कब अधिसूचना जारी हुई और इन पर टोल वसूली कब से शुरू हुई। जब इस सवाल का जवाब सदन में प्रस्तुत किया गया, तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। आरोप है कि कई सड़क परियोजनाओं में अधिसूचना और टोल वसूली की तारीखों में स्पष्ट अंतर है, जो नियमों का उल्लंघन है और सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन भी।
अधिसूचना और वसूली के बीच का विरोधाभास
प्रताप ग्रेवाल का तर्क है कि भारतीय टोल एक्ट (Indian Toll Act) के अनुसार, सरकार किसी भी सड़क पर बिना अधिसूचना जारी किए टोल नहीं वसूल सकती। सड़क जनता की संपत्ति है और सरकार उसकी ट्रस्टी है, इसलिए बगैर उचित अधिसूचना के टोल वसूली अवैध है। उन्होंने यह भी बताया कि कई सड़कों पर अधिसूचना जारी होने से पहले ही टोल वसूली शुरू कर दी गई थी, जिनमें भोपाल बायपास, इंदौर-उज्जैन मार्ग, सागर-दमोह मार्ग, भिंड-गोपालपुरा मार्ग, गुना-ईसागढ़ मार्ग, महू-घाटाबिल्लौद मार्ग और बीना-खिमलासा मार्ग शामिल हैं।
प्रताप ग्रेवाल ने यह भी आरोप लगाया कि इन अवैध वसूली से प्रदेश की 43 सड़कों पर करीब 603 करोड़ रुपये का लाभ कमाया गया है, जिसे जांच की आवश्यकता है। वहीं, PWD मंत्री राकेश सिंह का कहना है कि वसूली का पैसा सरकारी खजाने में जमा हुआ है, इसलिए इसमें कोई भ्रष्टाचार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अधिसूचनाएं कई बार बैकडेट में भी जारी होती हैं, इसलिए यह कहना गलत है कि विभाग ने अवैध तरीके से टोल वसूली की है।











