सहरसा नगर निगम में फर्जी निकासी का मामला और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल
बिहार के सहरसा नगर निगम में स्ट्रीट लाइट और डेकोरेटिव लाइट के रखरखाव के नाम पर हर महीने लगभग 50 लाख रुपये की कथित फर्जी निकासी का मामला अब राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर रहा है। यह मामला केवल भ्रष्टाचार का ही नहीं है, बल्कि सरकारी आदेशों के जारी होने, हटाए जाने और फिर से संशोधित होने की प्रक्रिया में भी गड़बड़ी का संकेत देता है। यह घटनाक्रम इस बात को उजागर करता है कि कहीं न कहीं सिस्टम में तकनीकी खामियों या हैकिंग की आशंका भी हो सकती है।
घोटाले की जड़: दो कंपनियों की भूमिका और जांच का खुलासा
शिकायत कोसी कॉलोनी निवासी राहुल कुमार पासवान ने दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि दो कंपनियों Aim of People और Narishakti Infratech & Development Pvt. Ltd के माध्यम से करोड़ों रुपये की अवैध निकासी हुई है। जांच में यह भी सामने आया कि इन दोनों कंपनियों के बीच अवैध फंड ट्रांसफर का भी मामला था। इस पूरे घोटाले में यह भी पता चला कि इन कंपनियों ने सरकारी फंड का गलत तरीके से उपयोग किया है, जो भ्रष्टाचार की जड़ को दर्शाता है।
आदेशों में बदलाव और सरकारी सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल
11 फरवरी को नगर विकास एवं आवास विभाग ने मेयर बैन प्रिया, उनके निजी सचिव राजीव झा और उनकी पत्नी पर FIR दर्ज करने का आदेश जारी किया। इस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। लेकिन 12 फरवरी को अचानक ही यह आदेश सोशल मीडिया से हटा दिया गया, और मेयर व उनके सचिव पटना पहुंचकर विभागीय अधिकारियों से मुलाकात भी की। उसी शाम विभाग के सोशल मीडिया पेज से FIR का आदेश हटा देना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं इस पूरे प्रकरण में कोई प्रभावशाली हस्तक्षेप हुआ है।
13 फरवरी को विभाग ने फिर से नया आदेश जारी किया, जिसमें मेयर और सचिव का नाम हटा कर सिर्फ इतना लिखा गया कि दोषियों के खिलाफ FIR दर्ज की जाए। इस बदलाव ने सरकारी मंशा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। मेयर बैन प्रिया ने 14 फरवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि उनके विरोधियों ने विभाग के पोर्टल को खरीदकर गलत रिपोर्ट डाली है। वहीं, सहरसा नगर आयुक्त ने भी राजीव झा की पत्नी की दोनों कंपनियों पर FIR का आदेश दिया, जो इस बात का संकेत है कि जांच में अनियमितता की पुष्टि हो चुकी है।
17 फरवरी को मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने स्पष्ट किया कि अभी किसी को क्लीन चिट नहीं दी गई है और जांच के बाद ही कोई कार्रवाई की जाएगी। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों आदेश को हटाया गया? क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का दबाव था, या फिर यह सिस्टम की आंतरिक हेरफेर का परिणाम है? अभी तक सरकार ने इन सवालों का जवाब नहीं दिया है। यह मामला सिर्फ एक नगर निगम घोटाले का नहीं है, बल्कि यह बिहार की प्रशासनिक पारदर्शिता, राजनीतिक दबाव और सरकारी डिजिटल सिस्टम की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। जांच जारी है, और अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सच्चाई सामने आएगी या फिर फाइलों के बीच कोई और आदेश चुपचाप बदल दिया जाएगा।









