सुप्रीम कोर्ट ने बोतलबंद पानी की गुणवत्ता पर याचिका खारिज की
देश में बोतलबंद पानी की मानकों को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई से इनकार कर दिया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने याचिका को ‘शहरी सोच से जुड़ा’ बताया और कहा कि देश की वास्तविक स्थिति इससे कहीं अधिक गंभीर है।
मुख्य न्यायाधीश ने पानी की गुणवत्ता को लेकर दी चेतावनी
सीजेआई ने टिप्पणी करते हुए कहा, “देश के बड़े हिस्से में लोगों को पीने का साफ पानी भी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पानी की गुणवत्ता का मुद्दा प्राथमिकता नहीं है। ग्रामीण इलाकों में लोग जमीन का पानी पीते हैं। आप बोतलबंद पानी में कौन-से तत्व मिलाए जाएं या हटाए जाएं, इस पर कोर्ट से निर्देश की अपेक्षा करना एक विलासिता है।” उन्होंने यह भी कहा कि यदि मानक मौजूद हैं, तो उन्हें लागू करने का जिम्मा सक्षम प्राधिकरण का है, जो इस पर विचार करेगा।
याचिका का तर्क और कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बोतलबंद पानी के लिए वैधानिक मानक मौजूद हैं और फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड्स का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। इस पर सीजेआई ने कहा कि यदि मानक हैं, तो उन्हें लागू करने के लिए सक्षम प्राधिकरण भी है, जो इस मामले में निर्णय लेगा। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या भारत में हम उन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जैसी कि UK (United Kingdom), Saudi Arabia (सऊदी अरब) या Australia (ऑस्ट्रेलिया) जैसे देशों में हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह याचिका ‘अर्बन फोबिया’ को दर्शाती है, जिसमें देश की वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज किया गया है।
सुनवाई के दौरान, सीजेआई ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर देखना चाहिए कि लोग किस तरह का पानी पी रहे हैं। महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे, तो उन्होंने पूरे देश की यात्रा की थी। याचिकाकर्ता को भी भारत की हकीकत को समझने के लिए ऐसा करना चाहिए।”
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यह मामला सामान्य पेयजल का नहीं है, बल्कि बोतलबंद पानी और प्लास्टिक से रिसने वाले रसायनों (DTPH) का है, जो मानव स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं। उन्होंने WHO (World Health Organization) के मानकों और यूरो-2 जैसे मानकों को लागू करने का हवाला भी दिया।
सीजेआई ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर विचार करने के लिए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) जैसी सक्षम संस्था मौजूद है। अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपना प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्रदान किया।
दरअसल, याचिका में दावा किया गया था कि भारत में बोतलबंद पानी के मानक पुराने हो चुके हैं और मिनरल वाटर कंपनियों को यूरो-2 जैसे आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने का निर्देश देना चाहिए।











