अफगानिस्तान से पाकिस्तान पर तालिबानी हमला
काबुल से पाकिस्तान पर फिर से तालिबान का आक्रमण करने का आदेश जारी किया गया है। इस आदेश का दावा तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के प्रमुख कमांडर नूर अली महसूद ने किया है, जो मुनीर फौज का सबसे बड़ा विरोधी है। उन्होंने बीती रात ही पाकिस्तान के पांच सैनिकों को मार गिराने का दावा किया है। इस घटना के बाद तालिबान ने एक बार फिर से पाकिस्तान की सेना को निशाना बनाया है। पाकिस्तान इस हमले से बुरी तरह से हतप्रभ और बौखलाया हुआ है, क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा कि अफगान तालिबान (Afghan Taliban) से कैसे निपटा जाए, जिसे उसने ही पाला-पोसा है।
पाकिस्तान की सेना का दावा और सीमा पर तनाव
पाकिस्तान की सेना ने आधिकारिक तौर पर जानकारी दी है कि अफगानिस्तान से हुई गोलीबारी में पांच पाकिस्तानी सैनिक शहीद हो गए हैं। साथ ही, सेना ने यह भी दावा किया है कि कुछ तालिबान लड़ाकों को मार गिराया गया है। ये संघर्ष खैबर पख्तूनवा प्रांत के पास सीमा के निकट हुए हैं, जिसे टीटीपी (TTP) का गढ़ माना जाता है। पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान से हथियारबंद लड़ाके सीमा पार करने का प्रयास कर रहे थे, जिस पर पाकिस्तानी सेना ने जवाबी कार्रवाई की। इस दौरान अफगान लड़ाकों ने पांच सैनिकों को मार गिराया और बड़ी संख्या में खैबर पख्तूनवा में घुसपैठ की है। आने वाले दिनों में पाकिस्तान पर और बड़े हमले होने की आशंका जताई जा रही है।
पाकिस्तान-आफगानिस्तान के बीच बढ़ती दुश्मनी
दोनों देशों के बीच की दुश्मनी अब तक के सबसे खराब दौर में पहुंच चुकी है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान की तालिबानी सरकारों के बीच संबंधों में खटास बढ़ती जा रही है। यह संघर्ष इतिहास की जड़ों से जुड़ा है, खासकर डूरंड रेखा (Durand Line) के विवाद से। यह सीमा रेखा 19वीं सदी में ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों के बीच एक रणनीतिक खेल का परिणाम है, जिसमें अफगानिस्तान को अंग्रेजों ने रूस के विस्तार से बचाने के लिए एक बफर क्षेत्र के रूप में इस्तेमाल किया था। 1893 में अफगान शासक आमिर अब्दुल खान और ब्रिटिश सरकार के सचिव सर मार्टिमर डूरंड के बीच इस सीमा पर समझौता हुआ था।
डूरंड रेखा का इतिहास और विभाजन
यह सीमा रेखा 2670 किलोमीटर लंबी है, जो चीन की सीमा से लेकर ईरान के साथ अफगानिस्तान की सीमा तक फैली हुई है। इस समझौते में स्थानीय गांवों और समुदायों के हितों को भी ध्यान में रखने का प्रयास किया गया था, लेकिन वास्तविकता में यह रेखा पश्तून आदिवासी क्षेत्रों से होकर गुजरती है। इससे कई गांव, परिवार और भूमि का विभाजन हुआ, जिसे अक्सर “घृणा की रेखा” कहा जाता है। इतिहासकार मानते हैं कि यह सीमा रेखा पश्तूनों को विभाजित करने की एक चाल थी, ताकि अंग्रेज आसानी से इन पर नियंत्रण रख सकें। 1947 में भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इस रेखा को अपनी सीमा मान लिया, जबकि अफगानिस्तान ने इसे अस्वीकार कर दिया। अफगानिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के सदस्यता के खिलाफ मतदान किया था, जो इस सीमा को मानने से इनकार करता है।











