पाकिस्तान में सेना का वर्चस्व और राजनीतिक प्रभाव
जून के महीने में अमेरिका के व्हाइट हाउस में हुई एक अनूठी बैठक ने पाकिस्तान में सेना की भूमिका को फिर से उजागर किया है। इस बैठक में पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को अकेले ही व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया गया, जबकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस दौरान मौजूद नहीं थे। यह घटना दर्शाती है कि पाकिस्तान में असली सत्ता सेना के हाथों में है, न कि राजनीतिक नेतृत्व में।
1947 से ही पाकिस्तान की सेना देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति पर अपना प्रभाव बनाए हुए है। सेना का यह वर्चस्व इतना मजबूत है कि देश के पहले राष्ट्रपति से लेकर वर्तमान तक, सेना ने बार-बार सत्ता पर कब्जा किया है। सेना का यह प्रभाव इतना गहरा है कि राजनीतिक नेतृत्व को अक्सर सेना के सामने झुकना पड़ता है।
सेना का राजनीतिक वर्चस्व और इतिहास
पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने सेना की सर्वोच्चता की कल्पना नहीं की थी। 1948 में क्वेटा में अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि सेना केवल जनता की सेवा करने वाले सैनिक हैं और राजनीतिक निर्णय नागरिकों का काम है। लेकिन समय के साथ, सेना ने अपने इस आदर्श से भटकते हुए, राजनीति में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।
1958 में जनरल अयूब ख़ान के नेतृत्व में तख्तापलट के बाद से सेना ने देश की सत्ता पर अपना कब्जा मजबूत किया। इसके बाद से ही सेना का राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ता गया है। जनरल जिया-उल-हक और परवेज़ मुशर्रफ़ जैसे नेताओं ने सेना की भूमिका को और भी मजबूत किया, जिससे स्पष्ट हो गया कि पाकिस्तान में असली सत्ता सेना के हाथों में है।
सेना का संविधान और लोकतंत्र के बीच संघर्ष
पाकिस्तान के इतिहास में सेना का यह वर्चस्व लोकतंत्र के लिए एक चुनौती रहा है। पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति जिन्ना ने सेना को केवल देश की रक्षा का जिम्मा सौंपा था, लेकिन सेना ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए राजनीतिक हस्तक्षेप शुरू कर दिया। 2022 में पूर्व सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा ने भी स्वीकार किया कि सेना ने अनैतिक रूप से राजनीति में हस्तक्षेप किया है।
पाकिस्तान में सेना का यह प्रभाव इतना गहरा है कि लोकतंत्र और कानून के शासन के बीच अक्सर टकराव होता है। सेना खुद को कानून से ऊपर मानते हुए, अपने हितों की रक्षा के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य करती है। हालांकि, 2007-2008 में सेना ने शासन विरोधी प्रदर्शनों के कारण अपने आप को सत्ता से दूर कर लिया, लेकिन उसके बाद से सेना ने लोकतंत्र को सहन करना शुरू कर दिया है।











