भारत में रूसी तेल आयात में संभावित कटौती की चर्चा
गुरुवार को उद्योग विशेषज्ञों ने बताया कि भारत की प्रमुख रिफाइनरियां रूस के दो बड़े तेल उत्पादकों पर नए अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन करने के लिए अपने रूसी तेल आयात में भारी कमी कर सकती हैं। यह कदम संभवतः अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते में आने वाली बाधाओं को दूर करने में मदद कर सकता है। इस बदलाव का समय ऐसे में आया है जब भारत को अमेरिका को अपने निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें से आधा हिस्सा रूसी तेल खरीद के बदले में लगाया गया है। भारत इस समय एक ऐसे व्यापार समझौते की दिशा में भी प्रयासरत है, जिसमें मॉस्को से कच्चे तेल के आयात को घटाकर टैरिफ को एशियाई देशों के समान स्तर पर लाया जा सके।
अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव और रूस से तेल खरीद में कटौती
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और यूरोप द्वारा लगाए गए नए प्रतिबंधों के बाद भारत अपने सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता रूस से कच्चे तेल की खरीद में भारी कमी कर सकता है। सूत्रों ने बताया कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड, जो रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाली निजी कंपनी है, अपने आयात को पूरी तरह से रोकने या बहुत कम करने की योजना बना रही है। सरकारी रिफाइनरियां भी इन नए प्रतिबंधों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अपनी खरीद रणनीतियों का पुनर्मूल्यांकन कर रही हैं। यह निर्णय यूक्रेन में जारी संघर्ष के कारण अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा रूसी ऊर्जा कंपनियों जैसे रोसनेफ्ट और लुकोइल पर नए प्रतिबंध लगाने के बाद लिया गया है। ब्रिटेन ने भी इन कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं, और यूरोपीय संघ ने रूसी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के आयात पर प्रतिबंध को मंजूरी दी है।
तेल कीमतों में उछाल और बाजार की प्रतिक्रिया
भारत द्वारा रूस से तेल आयात की समीक्षा के बाद गुरुवार को तेल की कीमतों में लगभग 3 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। ब्रेंट क्रूड वायदा 1.94 डॉलर या 3.1 प्रतिशत बढ़कर 64.53 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI क्रूड 1.89 डॉलर या 3.2 प्रतिशत बढ़कर 60.39 डॉलर प्रति बैरल हो गया। विश्लेषकों का मानना है कि यह उछाल इस आशंका के कारण है कि कड़े प्रतिबंध और रूस से निर्यात में गिरावट वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर सकती है। रॉयटर्स के अनुसार, बाजार विश्लेषक प्रियंका सचदेवा ने कहा कि रूस के प्रमुख तेल घरानों पर नए प्रतिबंध क्रेमलिन के युद्ध राजस्व को रोकने का प्रयास हैं, जिससे रूसी तेल का भौतिक प्रवाह कम हो सकता है और खरीदार अपनी मात्रा को खुले बाजार में पुनर्निर्देशित कर सकते हैं। यदि भारत अमेरिकी दबाव में रूस से तेल की खरीद कम करता है, तो यह संभावना है कि एशियाई मांग अमेरिकी कच्चे तेल की ओर बढ़ेगी, जिससे वैश्विक तेल कीमतें बढ़ सकती हैं।
भारतीय रिफाइनरियों का रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सरकारी स्वामित्व वाली रिफाइनरियां अपनी आपूर्ति व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन कर रही हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनका कोई भी कच्चा तेल सीधे रूसी तेल दिग्गज कंपनियों जैसे रोसनेफ्ट या लुकोइल से न आए। वहीं, निजी क्षेत्र की रिलायंस इंडस्ट्रीज, जो 2022 से रूसी तेल का प्रमुख आयातक रही है, अपने खरीद पैटर्न को सरकार की नीतियों के अनुरूप समायोजित करने की योजना बना रही है। सूत्रों ने बताया कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बढ़ते प्रभाव के कारण रिलायंस अपने आयात में तेजी से कटौती कर सकती है।
आगे की दिशा और वैश्विक बाजार का दृष्टिकोण
पिछले दो वर्षों में भारत का रूसी कच्चे तेल का कुल आयात बढ़ा था, क्योंकि सस्ते तेल की उपलब्धता ने भारतीय रिफाइनरियों को लाभ पहुंचाया था। लेकिन अब कड़े प्रतिबंध और अमेरिका के दबाव के कारण, भारत मध्य पूर्व और अफ्रीका जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख कर सकता है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इन प्रतिबंधों का दीर्घकालिक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है। रिस्टैड एनर्जी के विश्लेषक क्लाउडियो गैलिम्बर्टी ने कहा कि इन प्रतिबंधों से रूस के तेल उत्पादन या राजस्व में कोई खास कमी नहीं आई है। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ भारतीय और चीनी खरीदार प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदना जारी रखे हुए हैं, जिससे बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।











