मयंक चक्रवर्ती ने भारत का गौरव बढ़ाया
भारतीय शतरंज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर तब आया जब 16 वर्षीय युवा प्रतिभाशाली खिलाड़ी मयंक चक्रवर्ती ने असम और पूरे उत्तर-पूर्व भारत का पहला ग्रैंडमास्टर बनने का गौरव प्राप्त किया। स्वीडन के स्टॉकहोम में आयोजित 8वें ग्रैंडमास्टर टूर्नामेंट में उन्होंने अपनी अंतिम ग्रैंडमास्टर नॉर्म हासिल कर यह उपलब्धि हासिल की। इस सफलता के साथ ही वह भारत के 94वें ग्रैंडमास्टर बन गए हैं।
शानदार प्रदर्शन से हासिल की ग्रैंडमास्टर की उपाधि
इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में मयंक ने अपने खेल का जौहर दिखाया। उन्होंने नौ राउंड में से सात अंक प्राप्त कर पहला स्थान हासिल किया। इस दौरान उन्होंने छह मैच जीते, दो ड्रॉ खेले और केवल एक मैच में हार का सामना किया। खास बात यह है कि उन्होंने नॉर्वे के खिलाड़ी Aksel Bu Kvaloy को आधे अंक से पीछे छोड़ते हुए बढ़त बनाई। आठवें राउंड में स्वीडन के इंटरनेशनल मास्टर Philip Lindgren को हराकर उन्होंने ग्रैंडमास्टर नॉर्म के लिए आवश्यक 6.5 अंक पूरे कर लिए।
अंतिम राउंड में ड्रॉ से मिली जीत और नई ऊंचाइयां
टूर्नामेंट के अंतिम राउंड में मयंक ने इंग्लैंड के खिलाड़ी Jonah B Willow के साथ ड्रॉ खेला। इस ड्रॉ के साथ ही उन्होंने अपने करियर की सबसे बड़ी सफलता हासिल कर ली। इस प्रतियोगिता के दौरान उन्होंने 2500 Elo रेटिंग का महत्वपूर्ण आंकड़ा भी पार कर लिया, जो कि FIDE (Fédération Internationale des Échecs) की ग्रैंडमास्टर बनने की अनिवार्य शर्त है।
गुवाहाटी से शुरू हुआ उनका शतरंज का सफर
असम के गुवाहाटी (Guwahati) निवासी मयंक चक्रवर्ती लंबे समय से भारतीय शतरंज के उभरते सितारे के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने वर्ष 2024 में इंटरनेशनल मास्टर का खिताब हासिल किया था और अपने आयु वर्ग में लगातार शीर्ष खिलाड़ियों में शामिल रहे हैं।
बचपन से ही दिखी प्रतिभा और सफलता के कदम
मयंक पहली बार 2021 में चर्चा में आए थे, जब उन्होंने यूरोप के कई टूर्नामेंट में भाग लिया और अपनी रेटिंग को तेजी से 1800 से बढ़ाकर लगभग 2200 तक पहुंचा दिया। उन्होंने अंडर-11 राष्ट्रीय स्वर्ण पदक, अंडर-9 राष्ट्रीय रजत पदक और Asian Youth Chess Championship में अंडर-10 वर्ग में रजत पदक भी जीता।
परिवार का समर्थन और युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा
मयंक की इस सफलता के पीछे उनके परिवार का बड़ा योगदान रहा है। उनकी मां ने हमेशा उन्हें शतरंज खेलने के लिए प्रोत्साहित किया, जबकि उनके पिता ने बेटे के साथ टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी। मयंक चक्रवर्ती की यह उपलब्धि न केवल उनके लिए बल्कि पूरे उत्तर-पूर्व भारत के शतरंज जगत के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। इससे क्षेत्र के युवा खिलाड़ियों को खेल में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी।











