सूर्य देव पूजा का महत्व और परंपरा
हिंदू शास्त्रों में सूर्य देव को ब्रह्मांड का जीवनदायक माना गया है। पृथ्वी पर हर जीव का अस्तित्व सूर्य की प्रकाश और ऊर्जा पर निर्भर है। इसलिए प्रातः सूर्य के उदय होने पर उसे जल अर्पित करना आभार और शुभकामनाओं का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और ऋग्वेद, स्कंद पुराण, पद्म पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।
सूर्य पूजा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व
हिंदू धर्म में सूर्य देव को ऊर्जा, जीवन और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। पुराणों के अनुसार, सूर्य देव सभी देवताओं के साक्षी हैं, इसलिए उन्हें “साक्षी देवता” भी कहा जाता है। माना जाता है कि सुबह सूर्य को जल अर्पित करने से भगवान सूर्य प्रसन्न होते हैं और व्यक्ति को सौभाग्य, स्वास्थ्य और मानसिक शांति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य की पहली किरणें शरीर के लिए लाभकारी हैं। सुबह की सूर्य की किरणों में विटामिन D की प्रचुर मात्रा होती है, जो हड्डियों और त्वचा के लिए फायदेमंद है। जल अर्पण के दौरान सूर्य की किरणें जल से होकर आंखों तक पहुंचती हैं, जिससे दृष्टि में सुधार होता है। यह अभ्यास मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है, साथ ही शरीर और मन दोनों को स्वस्थ बनाता है।
सूर्य को जल अर्पित करने की विधि और लाभ
प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें। तांबे के लोटे में जल भरें, यदि संभव हो तो उसमें लाल फूल और अक्षत मिलाएं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य को अर्घ्य दें और “ॐ सूर्याय नमः” मंत्र का जप करें। जल अर्पित करते समय ध्यान रखें कि जल की धार सीधे सूर्य की किरणों पर जाए।
अर्घ्य देने के बाद सूर्य देव को प्रणाम करें और कुछ समय ध्यान लगाएं। इससे पाप नष्ट होते हैं और सौभाग्य में वृद्धि होती है। यह विधि जीवन में आत्मविश्वास और उत्साह बढ़ाती है, साथ ही करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा को मजबूत बनाती है। घर में धन, स्वास्थ्य और सफलता बनी रहती है।
यदि सूर्य उदय में विलंब हो जाए तो भी एक घंटे के भीतर जल अर्पित करना शुभ माना जाता है। दोपहर के बाद यह कार्य नहीं करना चाहिए। सूर्य पूजा से न केवल धार्मिक लाभ मिलता है, बल्कि यह वैज्ञानिक रूप से भी शरीर और मन दोनों के लिए फायदेमंद है।










