बिहार में सूर्य उपासना की प्राचीन परंपरा
बिहार की धरती पर सूर्य की पूजा की परंपरा हजारों वर्षों से जीवित है। ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि यहां के लोग लगभग ढाई हजार वर्ष पहले से सूर्य की आराधना कर रहे हैं। पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त प्रतिमाओं से यह स्पष्ट होता है कि सूर्य की मूर्ति पूजा का इतिहास शुंग काल से शुरू होता है। उस समय की एक दुर्लभ प्रतिमा बोधगया संग्रहालय में संरक्षित है। इसके अलावा गया के तपोवन से मिली कुषाण कालीन सूर्य प्रतिमा, जो लगभग दो हजार वर्ष पुरानी है, इस परंपरा की निरंतरता का प्रमाण है। इस प्रतिमा में सूर्य बूट पहने हुए दिखाई देते हैं और वेशभूषा में ईरान की झलक भी मिलती है।
सूर्य उपासना की सांस्कृतिक विरासत
बिहार की धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना में सूर्य उपासना का गहरा प्रभाव रहा है। सुल्तानगंज के मुरली पहाड़ से प्राप्त गुप्त कालीन प्रतिमाएं, कैमूर के मुंडेश्वरी मंदिर में स्थापित सूर्य मूर्ति, भोजपुर के तरारी से मिली मूर्तियां और नवादा की रूद्र भास्कर प्रतिमा, ये सभी इस बात के प्रमाण हैं कि सूर्य की पूजा बिहार की धार्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा रही है। प्रभात खबर में पहली बार इन 12 दुर्लभ सूर्य प्रतिमाओं का ऐतिहासिक संदर्भ प्रस्तुत किया गया है, जो इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
प्राचीन सूर्य मंदिरों का इतिहास और महत्व
बिहार में सूर्य की पूजा का इतिहास शुंग, कुषाण, पाल और गुप्त काल से जुड़ा है। शुंग कालीन प्रतिमा सबसे पुरानी मानी जाती है, जिसमें सूर्य के सात घोड़े, रथ और सारथी की मूर्तियां उकेरी गई हैं। यह लगभग 2200 से 2500 वर्ष पुरानी है। इसके अलावा गया के तपोवन से मिली कुषाण कालीन सूर्य प्रतिमा, जिसमें सूर्य बूट पहने हैं और ईरानी वेशभूषा की झलक मिलती है, इस परंपरा की निरंतरता को दर्शाती है। मुरली पहाड़, मुंडेश्वरी मंदिर, चौसागढ़, तरारी, रुद्र भास्कर और तारकेश्वरगढ़ जैसे स्थानों पर मिली प्रतिमाएं इस क्षेत्र की प्राचीन सूर्य पूजा की समृद्ध विरासत का हिस्सा हैं। इन मंदिरों और प्रतिमाओं का अध्ययन बिहार के धार्मिक इतिहास को समझने में मदद करता है।











