सामा-चकेबा का महत्व और परंपरा
सामा-चकेबा पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मिथिला की समृद्ध लोक-संस्कृति, कला और भावनाओं का अनूठा मेल है। इस त्योहार के दौरान महिलाएं समूह में गीत गाती हैं, पारंपरिक लोकधुनों पर नृत्य करती हैं और अपने घरों के आंगनों में रंग-बिरंगी मिट्टी की कलाकृतियों को सजाती हैं। रात के समय दीपकों की रोशनी और खुशियों का माहौल इस पर्व को विशेष बनाता है।
स्कंद पुराण से जुड़ी है इसकी परंपरा
सामा-चकेबा पर्व की शुरुआत स्कंद पुराण में वर्णित कथा के आधार पर मानी जाती है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण की एक सुंदर और सुशील पुत्री थी – सामा। उसकी माता का नाम जाम्बवती और भाई का नाम सांबा था। सामा का विवाह एक पुण्यशील व्यक्ति चक्रवाक (चकेबा) से हुआ था। द्वारका में एक दुष्ट व्यक्ति चूड़क ने सामा पर झूठे आरोप लगाकर उसे बदनाम कर दिया। इस घटना से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने सामा को पक्षी बनने का श्राप दे दिया। साथ ही, चक्रवाक ने भी अपने प्रेम और वफादारी में पक्षी का रूप धारण कर लिया। इस श्राप के कारण ऋषि-मुनि भी पक्षी बनकर भटकने लगे।
भाई की तपस्या और पुनः दिव्य स्वरूप
जब भाई सांबा को यह घटना पता चली, तो वह बहन के विरह में दुखी होकर कठोर तपस्या करने लगा। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने सभी को पुनः दिव्य स्वरूप प्रदान किया। इस घटना के दौरान यह वरदान भी दिया गया कि जो महिलाएं श्रद्धा से इस पर्व को मनाएंगी, उनके पति और भाई की आयु लंबी होगी और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहेगी। यही परंपरा मिथिला की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई है। तभी से मिथिला क्षेत्र में महिलाएं इस पर्व को बड़े उत्साह के साथ मनाती हैं।
सामा-चकेबा की पूजा और त्योहार का उद्देश्य
सामा-चकेबा की पूजा में मिट्टी से बनी पक्षी मूर्तियों का विशेष स्थान है, जिनमें सामा और चकेबा प्रमुख हैं। इसके अलावा सप्तभैया यानी सात ऋषियों का प्रतीक और छह आकृतियों को भी पूजा जाता है, जिन्हें शीरी सामा कहा जाता है। इन सभी मूर्तियों की पूजा गीत और नृत्य के साथ की जाती है। इस त्योहार का मुख्य उद्देश्य भाई की लंबी उम्र, पति के सुख-स्वास्थ्य, परिवार में सद्भाव और प्रेम बनाए रखना है। यह पर्व कुल सात दिनों तक चलता है, जिसमें महिलाएं मिट्टी की मूर्तियों की पूजा करती हैं और सूर्यास्त के बाद आंगन में रस्में निभाई जाती हैं। अंत में सातवें दिन मूर्तियों को नदी या तालाब में प्रवाहित या मिट्टी में विसर्जित किया जाता है।
सामा-चकेबा का मुख्य संदेश और मनाने का समय
यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्यार, पति-पत्नी के साथ और परिवार के प्रति निष्ठा का प्रतीक है। 2025 में यह पर्व 29 अक्टूबर से शुरू होकर 5 नवंबर तक मनाया जाएगा। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक गीत, नृत्य और पूजा के माध्यम से अपने प्रेम और श्रद्धा का प्रदर्शन करती हैं।









