राहु-केतु दोष का प्रभाव और उसकी सच्चाई
ज्योतिष शास्त्र में राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है, जो व्यक्ति के मानसिक, आध्यात्मिक और वैवाहिक जीवन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। अक्सर यह धारणा प्रचलित है कि इन ग्रहों की उपस्थिति से विवाह में देरी, भ्रम, या रिश्तों में टूट-फूट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। लेकिन क्या यह पूरी तरह से सत्य है? आइए जानते हैं इस विषय में ज्योतिषाचार्य एवं हस्त रेखा विशेषज्ञ चंद्रशेखर सहस्त्रबाहु का दृष्टिकोण।
क्या राहु-केतु विवाह को प्रभावित करते हैं?
राहु और केतु अकेले ही विवाह में बाधा नहीं बनते हैं। यह एक मिथक है कि इन ग्रहों की उपस्थिति से शादी में अनिवार्य समस्या होती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, विवाह योग कई ग्रहों जैसे शुक्र, बृहस्पति, सप्तम भाव और उनके स्वामियों के संयुक्त प्रभाव से बनते हैं। यदि ये योग मजबूत हैं, तो राहु-केतु का प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है। हालांकि, यदि कुंडली के सप्तम भाव में राहु-केतु की मौजूदगी होती है, तो यह प्रेम विवाह में देरी, रिश्तों में तनाव और पार्टनर से अलगाव जैसी समस्याएं ला सकता है।
राहु-केतु कब करते हैं प्रभावित?
ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि कुछ मामलों में जब राहु सप्तम भाव में होता है, तो यह रिश्तों में भ्रम, गलतफहमी और अविश्वास को जन्म दे सकता है। वहीं केतु दूरी का संकेत देता है, लेकिन यह प्रभाव तभी दिखता है जब कुंडली में अन्य शुभ ग्रह कमजोर हों। राहु-केतु दोष का आकलन केवल इन ग्रहों की उपस्थिति से नहीं किया जा सकता, बल्कि समग्र कुंडली, ग्रह दशा और ग्रह गोचर की वर्तमान स्थिति को देखकर ही सही भविष्यवाणी संभव है।











