पत्नी और पति के कर्मों का धार्मिक दृष्टिकोण
शास्त्रों में पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा गया है, और माना जाता है कि पति द्वारा किए गए पुण्य, भक्ति और भजन का आधा फल पत्नी को प्राप्त होता है। वहीं, पत्नी के पुण्य कर्मों का फल केवल उसी को ही मिलता है। इस संदर्भ में प्रेमानंद जी महाराज के आश्रम में एक भक्त ने पूछा कि यदि मेरे शुभ कर्मों का फल पत्नी को ही मिलता है और उसके कर्मों का फल भी वहीं रहता है, तो फिर मुझे क्या करना चाहिए? क्या विवाह ही नहीं करना चाहिए ताकि मेरा पुण्य मेरे पास ही रहे?
विवाह और धर्मकर्म का महत्व
प्रेमानंद जी महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा कि जब आप किसी स्त्री से विवाह करते हैं, तो आप उसका हाथ पकड़ते हैं और उसे अपनी धर्मपत्नी बनाते हैं। इसका अर्थ है कि आप अपने धर्मकर्म का आधा अधिकार उसे दे देते हैं। पत्नी का हाथ पकड़ने का मतलब है कि वह केवल अपने धर्मकर्मों में ही संलग्न रहती है, इसलिए उनके कर्मों का अधिकार केवल उन्हें ही होता है। महाराज ने बताया कि शास्त्रों में कहा गया है कि पत्नी का कर्तव्य है पति के सुख-दुख में साथ देना, उनके प्रति समर्पित रहना और तन-मन से सेवा करना। यदि पत्नी केवल इतना ही करें और भगवान का नाम जप, पूजा-पाठ या भजन-कीर्तन न भी करें, तो भी उन्हें पूर्ण फल प्राप्त होता है। वहीं, पति को पुण्य प्राप्ति के लिए धार्मिक कर्म, भजन-कीर्तन, पूजा-पाठ और नाम-जप जरूरी हैं।
विवाह का सही दृष्टिकोण और धार्मिक आचरण
प्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि यदि लोग यह सोचकर विवाह न करें कि उनका पुण्य पत्नी को ही मिलेगा, तो फिर किसी का विवाह ही नहीं होगा। इसलिए, पतियों को अपने कर्म और आचरण को अच्छा रखना चाहिए और बाकी सब कुछ भगवान पर छोड़ देना चाहिए। यदि इस सोच को अपनाया जाए, तो विवाह का उद्देश्य और धर्म दोनों ही सही ढंग से निभाए जा सकते हैं।











